Wednesday, June 17, 2009

बड़े बे-आबरू होकर..

धारावाहिक का एपिसोड जब शुरू होता है तो क्या होता है?पहले रीकैप फिर उस दिन का एपिसोड और खत्म होने के बाद आगे की झलक। सियासत के इस एपिसोड में भी हम पहले रीकैप देखते हैं। चुनाव के तीन महीने पहले। लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान और मुलायम सिंह यादव का चेहरा। तमतमाया हुआ, कि हम ही तो रगड़ देंगे सारी साटें।

इसीलिए एकजुट भी हो गए कि सौदेबाजी में आसानी होगी। यूपीए का साथ छोड़कर चौथा मोर्चा बनाया और काम शुरू। लालू यादव कभी जनता को गरियाते तो कभी धकियाते दिखे। मायावती तो जसे यूपी का ठेका ही लेकर बैठी रहीं। मुलायम भी कठोर बन गए। रामविलास पासवान की तो पूछिए ही मत। रहस्यमयी मुस्कान के साथ कि मैदान मार के दोबारा मंत्री पद के लिए दांत चिंघाड़ देंगे। लेफ्ट की लेफ्ट-राइट भी बरकरार रही।


हमलों का दौर चलता रहा। मोलभाव पार्टियां खड़ूस सासों की तरह बर्ताव करती रहीं और कांग्रेस सदाचार बहू की तरह जनता के फैसले का इंतजार करती रही। रीकैप खत्म। असली एपिसोड शुरू। मतगणना के बाद नजारा बदल गया। गेंद मैडम के पाले में। मोलभाव पार्टियों का रुख ऐसे बदला, जसे कोई बच्चा लॉलीपॉप देखकर लार टपकाने लगे। लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान को जनता ने जता दिया कि उनकी हैसियत जनता तय करती है।


कांग्रेस को भी इन टूटे बैसाखियों की कोई जरूरत समझ में नहीं आती है, लेकिन फिर भी ये अपना समर्थन थाल में सजाकर मैडम के पास ले जाने को तैयार हैं। ये वही लोग हैं, जो चुनाव के पहले जमकर निशाना साध रहे थे, पर अब लाइन लगाकर समर्थन देने का जुगाड़ सेट कर रहे हैं। समझ में नहीं आता कि किस मुंह से पहुंच गए समर्थन देने। एक बार ये भी नहीं सोचा कि कल वो क्या राग अलाप रहे थे। सबसे ज्यादा तो दुर्गति राम विलास पासवान की हुई है। उनके पास तो एक सीट भी नहीं है, जिसके दम पर वो सत्ता के दरवाजे तक जाने की हिम्मत भी जुआ पाएं। लेफ्ट को भी समझ में आ गया कि हर पल अपनी नीयत बदलने का क्या दुष्परिणाम हो सकता है। अब राजनीति के राखी सावंत अमर सिंह की अमर वाणी पर भी लगाम लग गई है। माया मेमसाब और साइकिल मुखिया इसलिए समर्थन देने को आतुर हैं कि कहीं सीबीआई का डंडा न पड़ जाए।


बेचारे लालू की रेल तो जाएगी ही तांगे तक के मंत्रालय की भी उम्मीद नहीं है। अब तो सब यही कह रहे हैं, मारो, लेकिन पर्दे के पीछे, इतनी बेइज्जती बर्दाश्त नहीं। आगे का हाल भी मोलभाव पार्टियों के पक्ष में नहीं दिखता। अब तो यही मिसाल याद आता है कि बड़े बे-आबरू तेरे कूचे से कम निकले॥
धर्मेद्र केशरी

1 comment:

  1. यह राजनिति चीज ही ऐसी है......

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