Sunday, June 10, 2018

अथ श्री 'नायक' केजरीवाल कथा

फोटो साभार

हां, तो अथ श्री केजरीवाल की ये काल्पनिक कथा तब शुरू होती है जब वो अपनी कुर्सी एक दिन के लिए श्री शीला माताजी शीक्षित को चैलेंज स्वरूप अर्पित कर देते हैं और मौके का पूरा फायदा उठाते हुए शीला माता उनकी लंका आई मीन उल्टे झाड़ुओं से प्रस्फुटित वाई फाई लैस दिल्ली को फिर से 'पुरानी दिल्ली' बनाने की कोशिशों में व्यस्त हो जाती हैं.  केजरीवाल की सत्ता अस्त व्यस्त हो जाती है. अब उसके आगे की कहानी.
कुर्सी से खुद ही कूदने वाले केजरीवाल हाथ जोड़कर शीला माई के दरबार में खड़े हैं. कहते हैं हे माता मैंने हर बार की तरह इस बार भी बस एक चाल चली थी, पासा फेंका था सोचा आप उसमें फंस जाएंगी, लेकिन आपने तो मुझे कैच आउट ही कर दिया. श्री शीला माता मुस्कुराईं और बोलीं वत्स केजरीवाल यही तो राजनीति की असली माया है, यहां मौका छीन लिया जाता है. वत्स तू भूल कैसे गया गया कि तूने भी सत्ता मेरे हाथ से ऐसे ही कब्जाई थी.
केजरीवाल उवाच लेकिन उसके लिए मैंने बहुत मेहनत की थी. झूठे वादों की लिस्ट बनानी पड़ी थी, रंगे सियारों से निपटा, बूढ़े बाबा को ठिकाने लगाया, जनता को मूर्ख बनाने का पूरा इतिहास पढ़ा और तो और अपने बच्चों की झूठी कसम भी खाई. श्री शीला माता अगेन मुस्कुराईं और बोलीं तू एक बात भूल रहा है वत्स, मौका तो मैंने ही दिया था तुझे, तो ये समझ ले कि बात सारा खेल मौके का ही है. अब फिर से जब तुझे मौका मिले तू कब्जा जमा लेना..इतना सुनते ही केजरीवाल के नयनों से अश्रुधारा फूट पड़ी. वो दहाड़े मारकर रोने लगे. अचानक ही उनके अंदर फिल्म सिंघम के प्रकाशराज की आत्मा घुस गई और वो जोर जोर से चिल्लाने लगे चीटिंग करती हैं आप चीटिंग, चीटिंग़ चीटिंग. मैंने एक मजाक क्या किया आप तो सीरियस ही हो गईं, आप नेता नहीं हैं विलेन हैं. बेचारा, सो रहा था मैं, सपने देख रहा था मैं. आता माझी सटकली. शीला माता केजरीवाल की हालत देखकर ठहाके लगाकर हंसने लगीं और हंसते हंसते ही केजरीवाल से पूछा अच्छा ये बताओ कि ये एक दिन के लिए मुझे कुर्सी सौंपने वाले चैलेंज का आइडिया आया कहां से था. केजरीवाल ने भरे कंठ से कुछ कहना चाहा़ लेकिन उन्होंने शीला माता से अपनी नायक फिल्म की सीडी वाली बात नहीं बताई और बड़बड़ाने लगे तुम्हारा तजुर्बा अगर 30 साल का है तो तुमसे 1 साल से लड़ते लड़ते मेरा तजुर्बा 31 साल का हो गया है.तभी उन्हे भौजाई ने झकझोरा क्या अंट शंट बक रहे हैं उठिए 10 बज गए न बर्तन धुले हैं अभी तक और न ही कपड़े, उठिए जल्दी. केजरीवाल की जान में जान आई और सुबह सुबह ही ट्वीट कर दिया ओजी वो सीएम वाली कुर्सी वाली बात मजाक किया था जी, मेरी हर बात की तरह इसे भी सीरियसली न लें प्लीज, हैं जी.


धर्मेंद्र केशरी

Monday, May 28, 2018

भरी कोरी जिंदगी


लिखना उस जगह पर जो खाली है कितना आसान है
भरे मिटे पन्नों पर कोई कलम चलती कहां है
कोरा सा वो कागज पर कोरा कहां है
जिंदगी लिखी थी उस पन्ने पर
पन्ना ही बचा जिंदगी कहां है
कोरा सा वो कागज पर कोरा कहां है
उस पन्ने पर स्याही दुलार की थी
गुस्साई आंखों में प्यार की थी
पथराई नजरों में इंतजार की थी
स्याही का रंग स्याह हो गया
खाली पूरा कतार हो गया
उम्मीदों की वो दवात कहां है
कोरा सा वो कागज पर कोरा कहां है
उमड़ते जज्बातों की लंबी है फेहरिस्त
सब कुछ लिख जाने का अरमान बहुत है
पर हो चुकी देर है अब तो
लिखने का वो साजो सामान कहां है
कोरा सा वो कागज पर कोरा कहां है
भरे मिटे पन्नों पर कोई कलम चलती कहां है

कोरा सा वो कागज पर कोरा कहां है

धर्मेंन्द्र केशरी

Saturday, August 5, 2017

कैसे...













भुला दूंगा...भूल तुम भी जाओगे
मगर इस दिल का संभालूं कैसे

बात तो साफ साफ कही थी तुमने
अपना हाल ए दिल समझाउं कैसे

मोहब्बत में कोई शर्त नहीं थी पहले
बंधा वादों में हूं निभाउं कैसे

तेरी बातें ही मेरा मरहम मेरी उम्मीद
तेरे बिन बेमोल हूं बताउं कैसे

मजाक मुहब्बत में गया कबसे बदल
दिल मेरी सुनता नहीं सुनाउं कैसे

पास आकर दूर जाने की ख्वाहिश है तुम्हें
अजीब सी कीमत है चुकाउं कैसे

बता दो तुम्हीे कैसे चाहूं तुम्हें
मुनासिब नहीं दूरी जाउं कैसे...


धर्मेंद्र केशरी





Saturday, May 13, 2017

कैसे समझाउं तुम्हे...


माना कि सोच एक सी नहीं
माना कि उम्र एक सी नहीं
माना कि दूरियां हैं मीलों की
माना कि यकीं कम है तुमको
माना कि दरम्यां है फासला
पर तुम ही बताओ 
मेरी सोच भी तुम
मेरी राह भी तुम
मेरी आस भी तुम 
मेरी ख़ास भी तुम 
मेरा यकीन भी तुम
मेरा वजूद भी तुम
खुद को खोया है तुममे
साथ रहना है तुमको भी
फिर ये संशय कैसा?
कैसी दुविधा का जाल है?
कहूंगा बस इतना ही
हर खुशी की सौगात दूंगा
हाल कैसा भी हो पूरा साथ दूंगा
अपने फैसले पर न पछताओगे तुम
ऐसा दिन दूंगा, ऐसी रात दूंगा।

धर्मेंद्र केशरी

Friday, April 24, 2015

मर गया...चलो राजनीति—राजनीति खेलते हैं !


एक बड़ी खबर आ रही है दिल्ली से...जंतर मंतर पर आम आदमी पार्टी की रैली के दौरान एक किसान ने आत्महत्या कर ली...पेड़ पर किसान ने लटक कर खुदकुशी कर ली...जबकि कुछ ही मीटर की दूरी पर आम आदमी पार्टी के राजा हरिशचंद्र के वंशज और ईमानदार दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल बैठे थे और उनके साथ उनके ईमानदार, हाजिरजवाब और कर्मठ नेता कुमार विश्वास व उनके भी महान साथी नेता भी मौजूद थे...

किसान आम आदमी पार्टी का चुनाव चिन्ह झाड़ू लेकर पेड़ पर चढ़ा था...अब वो खुदकुशी करने पेड़ पर चढ़ा था या रैली को पोलिटकल माइलेज देने के लिए चढ़ाया गया था इस सच का भी किसान गजेंद्र के साथ ही स्वर्गवास हो गया है...जंतर मंतर पर हजारों की संख्या में आम आदमी पार्टी के बुद्धिजीवी कार्यकर्ता भी थे। वो मुख्यमंत्री भी थे, जिन्होंने खंभे पर कभी सीढ़ी लगा लगाकर बिजली के कनेक्शन जोड़े थे, लेकिन अब वो मुख्यमंत्री बन गए हैं, इसलिए न वो और न ही उनके आंदोलनकारी अभूतपूर्व कार्यकर्ता उस किसान को बचाने के लिए पेड़ पर चढ़ सकें, हां तालियां खूब मिलीं। पार्टी के बड़े नेता और पूर्व बड़े पत्रकार आशुतोष ने भी सच ही कहा कि अगली बार ऐसा होगा तो वो अरविंद केजरीवाल से पेड़ पर चढ़ने के लिए कहेंगे...

नेताओं के सामने ही किसान लटक गया, लेकिन भाषणबाजी बेहद जरूरी, क्योंकि रैली किसानों के लिए थी और किसानों की समस्या के निदान के लिए मौत के बाद भी रैली चलनी चाहिए और वो चली भी...हालांकि कुमार विश्वास जी का कहना है कि उन्होंने दिल्ली पुलिस से अपील की थी, लेकिन पुलिस ने उनकी इसलिए नहीं सुनी क्योंकि वो केंद्र सरकार के अंतर्गत आती है, लिहाजा पुलिस ने उनकी नहीं सुनी...पुलिस भी क्यों सुने ऐसी रैलियां तो होती ही रहती हैं और ऐसी मौतें भी...

ये वीडियो आप एक्सक्लूसिव हमारे चैनल पर देख रहे हैं...आपको बता दें कि हमारे साथ साथ लगभग 300 कैमरे उस किसान की पूरी हरकत को लगातार कैमरे में कैद कर रहे थे, लेकिन किसी ने न तो उसे बचाने के लिए सोचा और न ही खुद पुलिस को इत्तला दिया...जैसे गाड़ी रोकने पर वो ट्रैफिक पुलिस को हड़काते हैं, वैसे ही हड़काकर किसी को भी कुछ नहीं कहा...क्योंकि अगर वो मदद के लिए जाते तो लाइव मौत का वीडियो हम आपके पास एक्सक्लूसिव नहीं पहुंचा पाते...हम पत्रकार हैं और आरोप लगाने से हमारा सरोकार है...वो बच जाता तो पूरे देश में ये हो हल्ला मचता क्या ?

 बहरहाल इस बीच कांग्रेस के अजय माकन ने कहा है कि वो किसान की मौत से दुखी हैं, और मुद्दे पर कोई राजनीति नहीं करना चाहते, लेकिन किसान की मौत का सारा दोष आप पर मढ़ा है...वहीं बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि इस दुख ​की घड़ी में वो कोई राजनीति नहीं करना चाहते, लेकिन ये जरूर कहा कि आम आदमी पार्टी ने राजनीति के लिए एक किसान को आत्महत्या के लिए विवश कर दिया...संसद में भी मुद्दा जोरों पर उठा..प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों से कहा कि वो उनके साथ हैं, लेकिन कैसे साथ हैं ये नहीं बताया...फिलहाल पूरा राजनीति जगत इस बेचारे किसान के आकस्मिक मौत से सदमे में है और कोई इसका राजनीतिक लाभ नहीं उठाना चाहता है...इस बीच खबर आई कि आप नेता आशुतोष किसान की बेटी से बातकर इतने व्यथित हुए कि बहस के दौरान ही फूट—फूटकर रोने लगे...और सभी नेताओं से अपील की कि इस मुद्दे का राजनीतिकरण न करें, जबकि यही अपील सभी राजनीतिक दल कर रहे हैं...

बहरहाल एक किसान देश के बुद्धिजीवियों के सामने मर गया...इसकी जांच होगी और दोषी को सजा मिलेगी...पर क्या वाकई सजा मिलेगी...किसान की आत्मा भी यही सवाल कर रही होगी...वैसे हमें गर्व है कि हम किसान प्रधान देश में रहते हैं और हमारे देश के राजनेता किसानों को लेकर बेहद संवेदनशील हैं.. किसानों को वोटबैंक समझकर काम नहीं करते...और उनकी भलाई के लिए संसद से सड़क तक संघर्ष करते हैं...हमें गर्व है हमारे राजनेताओं पर पारंपपरिक पुरानी पार्टियों और स्वच्छ, ईमानदार और आम आदमी की भलाई के लिए राजनीति में आई आम आदमी पार्टी पर भी...जय जवान, जय किसान जय हिंद...ऐसे ही घटना के इंतजार में...फिलहाल दीजिए इजाजत...नमस्कार...

धर्मेंद्र केशरी

Wednesday, April 8, 2015

एक जैसी स्वामीभक्ति की अलग-अलग सौगात, नेताजी को मेवा मिला घबड़ू को पड़ी लात!



घबड़ू आज घबड़ाया नहीं था। एक नेताजी ने उसे प्रमोशन का मंत्र दे दिया था। ये वही नेताजी थे, जिन्होंने पहले भी उसके गुरु को न पसंद करने वालों को पड़ोसी मुल्क जाने की सलाह दी थी। उस वक्त का फायदा ये था कि उसके गुरु ने चेले को अपने खेमे में ले लिया, इस बार भी फायदा होना ही होगा, बाद में होगा। घबड़ू को ये आइडिया उस वक्त भी आया था, जब एक नेताजी ने कहा था कि वो अपनी मैडम के लिए जान तक दे सकते हैं।

मैडम को उनकी चापलूसी मतलब स्वामीभक्ति इतनी पसंद आई कि ए ग्रेड कैटेगरी में शामिल कर लिए गए। भले ही पार्टी का बंटाधार हो गया, पोस्ट बदल दी गई हो, लेकिन मैडम जी का उनके प्रति प्यार खत्म नहीं हुआ। सच तो ये है कि मैडम के लिए जितने लोगों ने स्वामीभक्ति दिखाई और जी हुजूरी की, सभी को उच्च पद प्राप्त हुए। सेवा का मेवा खूब रगड़ा उन्होंने। वही लोग कड़ी निंदा कर रहे हैं। आखिर मैडम को आगे भी तो खुश रखना है।

खैर घबड़ू को मिल गया नया आइडिया, सो घबड़ू ने सोचा कि अपने मालिक के प्रति वफादारी दिखाकर प्रमोशन पाने का यही शानदार मौका है।
घबड़ू रोज की तरह दुकान पर काम कर रहा था। एक ग्राहक आया, शिकायती लहजे में बोला साह जी सामान में खोट था, माल अच्छा नहीं दिया आपने, गलत बात है ये। घबड़ू तो स्वामीभक्ति दिखाने की ताव में था ही। साह जी कुछ बोलते उससे पहले ही पटककर चढ़ बैठा ग्राहक पर और बोला मेरे मालिक को आंख दिखाता है। तुझे मेरे मालिक का माल नहीं पसंद आ रहा है तो भाग जा पड़ोस की दुकान में किसी ने तुझे मना नहीं किया है। साह जी कुछ कह पाते उससे पहले ही घबड़ू ने ग्राहक को दो चांटो का स्वाद भी चखा चुका था। साह जी अपनी गद्दी से कूदकर आए और को डपटते हुए ग्राहक के पैर पकड़ लिए। ग्राहक अपने मुखारबिंद से साह जी और घबड़ू की मां बहन को एक करता हुए देख लेने की धमकी के साथ वहां से निकला।

साह जी घबड़ू पर पिल पड़े तो जवाब मिला कि कोई उन पर आंख दिखाए घबड़ू बर्दाश्त नहीं कर सकता। अब साह जी क्या करते आखिर घबड़ू ने उनकी स्वामीभक्ति के लिए ऐसा किया था। चाहकर भी घबड़ू को कुछ न कह सके। घबड़ू को लगा कि तीर निशाने पर लगा है अब मालिक की दया दृष्टि उस पर बरसेगी जरूर। ग्राहकों का सिलसिला लगा रहा। थोड़ी देर बाद एक और साह जी से माल की समय से डिलीवरी न होने की शिकायत करने लगा। वो साह जी पर चढ़ा ही जा रहा था। घबड़ू के सामने एक और सुनहरा मौका था, उसे फिर पड़ोस जाने की सलाह देने वाले और अपनी जान लुटाने वाले नेताओं का मंत्र याद आने लगा। इस बार भी घबड़ू ने ग्राहक को जमकर पेला।

साह जी के मना करने के बावजूद वो ग्राहक को लतियाता रहा और पड़ोस की दुकानों में जाने की सलाह देता रहा। साह जी के सब्र का बांध टूट गया। घबड़ू के पीठ पर चढ गए और मुक्केबाजी की प्रतियोगिता में जुट गए। दुखी मन से घबड़ू ने कहा कि मैं आप के लिए यहां अपनी जान की बाजी लगा रहा हूं और मुझे ही दिए जा रहे हैं। साह जी ने कहा— तेरे इस करतूत से तो मेरे सभी ग्राहक भाग जाएंगे, भाग यहां से अपनी स्वामिभक्ति लेकर, नहीं चाहिए तेरी स्वामीभक्ति।

घबड़ू आंखों में आंसू भर कर दुकान से निकला, नेताजी की सीख उस पर भारी पड़ गई। वो सोच रहा था कि नेताजी ऐसा बोलें तो उनकी पौ बारह और यहां तो वो नौकरी से गया। आखिर गलती हुई कहां? उसने भी तो वही किया था जो नेताजी ने किया था, फिर नेताजी कैसे बच गए?

धर्मेंद्र केशरी

Thursday, April 2, 2015

इससे बड़ी दुख की बात कोई और नहीं हो सकती !


नेताजी के सामने चैनलों के माइक की दुकान सज चुकी थी। गिनते—गिनते जब थकान होने लगी तो नेताजी के कहे पर फोकस किया। एक फ्रेंच कटिए संवाददाता ने पूछा नेताजी पाकिस्तान की ओर से लगातार हमले हो रहे हैं, लेकिन सरकार खामोश बैठी है? सवाल दगा, नेताजी उफन ही रहे थे सत्ता पक्ष पर, धांय से अपना जवाब भी ठेल दिया। किसी ने सोचा नहीं था ऐसा होगा, जनता से कहा था पाकिस्तान आंख नहीं दिखाएगा, पर हो क्या रहा है, इससे बड़ी दुख की बात कोई और नहीं हो सकती।

 नेताजी के ललाट पर इतनी चिंता की लकीरें कुलबुलाने लगीं जैसे चींटियां अपने बिल से निकल आई हों। सवाल खत्म होते ही चश्मिश मोहतरमा ने सवाल दागा, नेताजी रेप की घटनाएं तो रूक ही नहीं रहीं हैं, बुजुर्ग महिला को भी नहीं छोड़ा जा रहा, आपका क्या कहना है? नेता जी की ललाट पर और भी चिंता की लकीरें निकल आईं। जवाब दिया, हमारी सरकार में कभी किसी बुजुर्ग महिला के साथ तो कम से कम बलात्कार नहीं हुआ, इससे बड़ी दुख की बात कोई और नहीं हो सकती। उनके माथे के बल थोड़ा आराम फरमाते उससे पहले ही एक और सवाल दग गया, नेताजी घर वापसी पर क्या कहेंगे? नेता जी ने मुखमुद्रा बदली, बोले— हम धर्म निरपेक्षता के पुजारी हैं, हमारी सरकार में धर्म भले ही बदले जाते रहे हों, पर घर वापसी की किसी ने कोई बात नहीं की, हम निंदा करते हैं, इससे बड़ी दुख की बात कोई और नही हो सकती।

तभी एक सज्जन जो ​जिनके हाथ में मोबाइल था, नेताजी के मुंह के पास ले जाकर बोले— नेताजी काले धन के मुद्दे पर क्या कहेंगे? सवाल पर थोड़ा हड़बड़ा से गए नेताजी। नेताजी का चेहरा फक पड़ गया, जैसे किसी ने दुखती रग पर हाथ रख दिया हो, पर अभिनय में अभ्यस्त नेताजी ने बात संभाली बोले— यही तो हम कहते हैं काला धन वाला धन कुछ नहीं है, जनता को काला धन के नाम पर ठगा गया है। आखिर अभी तक पैसा सबके एकाउंट में क्यों नहीं आया, इससे बड़ी दुख की बात कोई और नहीं हो सकती। तभी किसी ने सवाल बम दागा कि नेताजी दस ​लखिए सूट पर भी तो कुछ कहिए। नेताजी को तो यही मौके चाहिए था, बोले अरे हम तो गरीब पार्टी से ठहरे हमारे, हम खादी से ही काम चलाते हैं, गरीब का पैसा लूट कर हम दस लाख का सूट नहीं पहन सकते, इससे बड़ी दुख की बात कोई और नहीं हो सकती।

 तभी किसी बुजुर्ग टाइप रिपोर्टर ने नेताजी से पूछ लिया, पर नेताजी पिछली सरकार के घोटाले में सबसे ज्यादा नाम आपका ही उछला था,आप पार्टी के सबसे रईस व्यक्ति भी हैं, आपकी सरकार में महंगाई की तरह बलात्कार भी बढ़ा था और भ्रष्टाचार भी, इस पर क्या कहेंगे? इस बार चिंता की लकीरें फन्न से गायब हो गईं और त्योरियां चढ गईं। तमतमाते हुए बोले— कहां के रिपोर्टर हो जी। सवाल पूछना भी नहीं आता। बात इस सरकार की हो रही है या उस सरकार की। कोई सिद्ध करके दिखाए हम पर आरोप। संवाददाता सम्मेल निरस्त हो चुका था। जब तक दूसरों की गिरहबान पर हाथ था ठीक था, खुद पर आते ही मामला गड़बड़ा गया। सही ही तो कहा था नेताजी ने। सरकार ये हो या वो, हर कोई जनता को ही उल्लू बनाता आया है और महाराज आरोप जल्दी सिद्ध होते भी हैं क्या? इससे भी बड़ी दुख की बात हो सकती है, लेकिन ये दुख की बात जरूर है।

धर्मेंद्र केशरी