Sunday, July 24, 2011

तुम हिंदू को कि मुसलमान?


एक दिन मैं ऑफिस आने के लिए बस का इंतजार कर रहा था। काफी देर से बस नहीं रही थी। मैं कानों में इयरफोन लगाए गाने सुन रहा था। बस स्टॉप के पास ही कूड़ादान है। देखा कि एक करीब सात-आठ साल का बच्चा कंधे पर प्लास्टिक की बोरी लटकाए कूड़ेदान से कुछ बीन रहा था। वो प्लास्टिक की बातलें और थैलियों को इकट्ठा कर रहा था। मैं उसके पास चला गया। बच्चे का नाम सलीम था। मैंने उससे पूछा कि प्लास्टिक बेचने पर उसे कितना मिलता है। बच्चे ने बताया कि प्रति किलो प्लास्टिक बेचने पर उसे दस रुपए मिलते हैं।

सूरज चढ़ा हुआ था और धूप बहुत तेज थी। उस तेज धूप में भी छोटा बच्चा पन्नियों और बोतलों को इकट्ठा करने में लगा हुआ था, वो भी सिर्फ आठ-दस रुपयों के लिए। मैंने उससे पूछा कि वो पढ़ाई करता है या नहीं। बच्चे ने जवाब दिया कि वो पढ़ाई नहीं करता है। वजह भी उसने बताई कि वो इस काम में लग गया है और घर में अभाव हैं, इसलिए उसे भी पैसों का जुगाड़ करना पड़ता है। पर बच्चे ने मुझसे ये भी कहा कि वो पढ़ना चाहता है। बच्चा जिस झुग्गी में रहता था, वहां से मेरा सेक्टर कुछ ही दूरी पर है। मैंने सोचा अगर इसके जसे और भी बच्चे होंगे तो उन्हें पढ़ाया तो जा ही सकता है। मैंने उससे ये भी पता कर लिया कि उसके जसे और भी बच्चे हैं, जो पढ़ नहीं पाते हैं।

मैंने कहा कि वो अपने पिता या किसी का नंबर दे दे ताकि मैं फोन कर सकूं, पर ये भी समझ सकता था कि बच्चे को नंबर कहां से याद रहते। मैंने उसे अपना नंबर दिया और कहा कि अपने पापा से कहना कि वो मुझसे बात कर लें। मैं जाने को था तभी सलीम ने मुझसे कुछ ऐसा पूछा कि मैं हैरत में पड़ गया। उसने मुझसे पूछा कि तुम हिंदू हो कि मुसलमान? मैं एक बच्चे के मुंह से ये सवाल सुनकर खामोश खड़ा रहा, फिर उसे समझाया कि सबसे पहले एक इंसान, फिर कुछ और हूं।
सलीम को भी समझाया कि वो इन बातों में पड़कर एक अच्छा इंसान बने। जानता हूं कि मैंने जो कुछ कहा शायद उसे समझ में आया हो, पर उसका ये सवाल तुम हिंदू हो कि मुसलमान मुङो आज भी खटकता है कि इस छोटी सी उम्र में उसे इंसान की इस तरह पहचान करना किसने सिखाया होगा? किसने उसके मन में इस पेचीदा सवाल को जन्म दिया होगा? बच्चे ने तो बस मुझसे मेरी पहचान पूछी थी, जो उसके बाल मन में भरा गया होगा, पर उसके बाल मन पर ये बोझ लादा किसने?

धर्मेद्र केशरी

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