Saturday, February 20, 2010

हुस्न नहीं, हुनर बोलता है

पत्रकारिता में इन दिनों महिलाओं को लेकर कुछ ज्यादा ही चर्चा हो रही है। ये सच है कि बिना जाने लोग महिला पत्रकारों के आचरण पर कीचड़ उछालने से भी बाज नहीं आते हैं। आज हर फील्ड में महिलाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। अब वो जमाना लद गया, जब उन्हें घूंघट में घर बैठाने की परंपरा थी, पर अब बहुत कुछ बदल चुका है। सही भी है। विकसित देश बनने के लिए आधी आबादी का आगे आना भी बेहद जरूरी है। जब दोनों पहिए सही-सलामत होंगे तो गाड़ी न सिर्फ पटरी पर आती है, बल्कि तेज रफ्तार से दौड़ती भी है। बात मीडिया की, तमाम बातें हुईं कि महिला पत्रकार अपने हुस्न के दम पर नौकरी पाती हैं और न जाने क्या-क्या करने के बाद ही वो ऊपर पहुंची हैं।

आखिर ये सोच लोगों ने बना क्यों रखी है। हुनर भी तो कोई चीज है और अगर वो लड़कों की तरह काम करने का दमखम रखती हैं तो इस तरह की बातों से उनका मनोबल गिराने की क्या जरूरत है। दरअसल, अभी भी समाज पुरुष प्रधान है, वो महिलाओं के दखल को बर्दाश्त ही नहीं कर पाता है। हम किसी के चरित्र पर बेबाक टिप्पणी बिना सच्चाई के कर देते हैं, पर कसूरवार कौन हैं। वो जिनका भी जुनून पत्रकारिता है? हमेशा ये बात कही जाती है कि प्रतिभा अपना रास्ता खुद ब खुद बना लेती है। देर भले ही हो जाए, पर कामयाबी मिलती ही है, फिर चाहे वो लड़का हो या लड़की। पत्रकारिता में ऐसे तमाम नाम हैं, जो अपने काम के दम पर शीर्ष पर पहुंची हैं। पुरुषों की तरह उन्होंने भी संघर्ष किया है। जरा सोचिए, पुरुष प्रधानता के बावजूद वो मुकाम बनाने में सफल रहीं। कुछ अपवाद भी हैं, जो हर क्षेत्र की तरह इस फील्ड में भी हैं।

दरअसल, परेशानी हमारी सोच में है। हमने सोच ही ऐसी बना रखी है। एक वाकया सुनाता हूं। मेरे एक दोस्त के सीनियर ने किसी से उसकी नौकरी की बात की। चैनल के वो बंधु दोस्त के सीनियर की बात सुनते रहे, फिर कहने लगे, कोई लड़की हो तो बताओ, फिलहाल यहां लड़कियों को ही लिया जा रहा है। ये एकतरफा सच हो सकता है, पर उन बंधु के मनोभावों को तो देखिए। आप दोष किसे देंगे? आखिर वो कहना क्या चाहते थे, सोच किसकी गलत है? और ये बहुत बड़ा सच है कि ऐसे लोगों की कमी नहीं है। कई तो ऐसे हैं, जो अपनी पद और प्रतिष्ठा का गलत उपयोग करने से भी नहीं चूकते हैं। अब मीडिया में चाटुकारिता का जमाना है। हो सकता है कि मैं गलत होऊं, पर परिस्थितियां कुछ ऐसी ही हैं कि यहां लॉबिंग चलती है। सीनियर की जी-हूजूरी से ही तरक्की मिलती है।

फिर अपने उसूलों पर चलने वाला पत्रकार भी सोचने पर मजबूर हो जाता है कि क्या उसे भी चापलूस होना चाहिए? महिला पत्रकार भी इस जाल से नहीं बच पाती हैं। लॉबिंग से वो भी दूर नहीं रह पातीं, पर इसका मतलब तो ये नहीं कि उनके चरित्र पर कीचड़ उछाला जाए। हम अक्सर कह देते हैं कि हुस्न के दम पर फलाने मौज की नौकरी काट रही हैं, पर दिल पर हाथ रखकर देखें, क्या पुरुष पत्रकार भी चाटुकारिता नहीं करते? मेरी बातों से कुछ लोगों को गुस्सा आ सकता है, पर यही सच है। यहां हुस्न के साथ हुनर की भी जरूरत पड़ती है और जिसके पास सुंदरता है उसे चरित्रहीन कहने का हक तो किसी को नहीं।

हां, एक बात ये भी है। अगर किसी महिला पत्रकार के साथ कोई घटना होती है तो उसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार वो भी हैं। अगर वो विरोध करें तो किसी की क्या मजाल जो उन्हें हाथ लगाकर बात करे या उनके साथ बदसलूकी की हिम्मत करे। मेरी एक मित्र हैं, वो एक समाचार पत्र में थीं। बातों ही बातों में उन्होंने बताया कि उनका पूर्व बॉस उन्हें आई टॉनिक समझता था और कई बार उनका हाथ भी पकड़ चुका था। इन सबके बाद भी वो चुप रहीं। नौकरी खोने का डर रहा। मैं समझता हूं कि अगर उन्होंने आवाज उठाई होती तो उनकी जगह वो सीनियर ही बाहर होता। इन चर्चाओं को दरकिनार करते हुए अगर किसी की प्रतिभा का आंकलन किया जाए तो ही ठीक है। और रही बात मर्यादा की, तो इस पर दोनों को खरा उतरना चाहिए, फिर वो चाहे कोई पुरुष हो या कोई महिला।

धर्मेद्र केशरी

पत्रकारिता, फिल्में और समाज सेवा

पत्रकारिता फिल्मकारों, लेखकों के लिए हमेशा दिलचस्प विषय रहा है। कई फिल्मकारों ने अपनी बात पत्रकारों के माध्यम से ही कही हैं। पुराने-नए सुपरहीरो पर भी नजर डालें तो फिल्मों में ही उनका दूसरा रूप पत्रकार का होता है।

पत्रकारिता। वो माध्यम, जिससे जुड़ती है दुनिया। पत्रकारिता नई नहीं है। बहुत पुरानी। जब से समाज है, तभी से पत्रकारिता भी। कभी साहित्यकार पत्रकार की भूमिका में हुआ करते थे, पर अब पेशेवर लोग इस क्षेत्र में आने लगे हैं, पर स्वरूप अभी भी वही है। समाज सेवा की भावना से ओतप्रोत लोग ही इस जुनूनी क्षेत्र में रमते हैं। कभी आपने ये सोचा है कि सुपरहीरो किरदारों का असल पेशा क्या था! चाहे वो सुपरमैन हो, स्पाइडरमैन या भारतीय सुपरहीरो शक्तिमान। ये तीनों दुनिया को बचाने का कारनामा करते हैं, पर इनका असली पेशा क्या था। जी हां, इनका इन फिल्मों में पेशा था पत्रकारिता। फिल्में और किरदार काल्पनिक हो सकते हैं। फंतासी भी अलग चीज है, पर इनके फिल्मी पेशे पर नजर डालें तो पत्रकारिता की अहमियत का पता चलता है।

कई दशक से बच्चों, बड़ों और बूढों पर राज करने वाले किरदार सुपरमैन का जिक्र करते हैं। वैसे तो सुपरमैन लोगों को बचाने का काम करता था। वो दुनिया को बुरे इंसानों से बचाता था, पर जब वो सुपरमैन नहीं होता था तो उसका व्यवसाय क्या था। कभी गौर किया आपने। सुपरमैन भी पेशे से पत्रकार था। पहले वो लोगों के दुख दर्द पर गौर करता था बाद में उन्हें समस्याओं से निजात दिलाता था। अब आते हैं स्पाइडर मैन पर। फिर एक काल्पनिक कथा। सुपरहीरो, जो इंसानियत की रक्षा के लिए मरने को भी तैयार है। वो अपनी शक्तियों से दुश्मनों को मात देता है। अब जरा स्पाइडर मैन के दूसरे रूप की ओर नजर डालते हैं। स्पाइडर मैन का पेशा भी पत्रकारिता था। वो पेशे से फोटो जर्नलिस्ट था और लोगों के बीच हमेशा रहता था।

ऐसे ही भारतीय सुपरहीरो शक्तिमान। शक्तिमान लोगों की मदद करता है, लेकिन उसकी दूसरी जिंदगी होती है गंगाधर के रूप में एक पत्रकार की। माना कि ये तीनों कैरेकटर काल्पनिक हैं और पूरी तरह से फंतासी पर आधारित हैं। कोरी कल्पना, पर गौर करने वाली बात ये है कि लेखक ने अपने किरदारों का दूसरा रूप पत्रकार का ही क्यों रखा! वो चाहता तो किरदारों का पेशा डॉक्टर, इंजीनियर या वैज्ञानिक का भी रख सकता था।

दरअसल, यहां पत्रकारिता की अहमियत पता चलती है। यही ऐसा माध्यम है, जिससे लोगों से जुड़ा जा सकता है। सच्चाई को करीब से देखने की आदत हो जाती है। व्यावहारिकता में इंसान ज्यादा यकीन करता है। कहने का मतलब ये कि पत्रकारिता हमेशा से समाज सेवा के लिए तत्पर रहा है। पत्रकारिता में खबरें ही हथियार होती हैं और लोगों के बीच पहुंचने का माध्यम भी। इन किरदारों और फिल्मों के लेखकों को पत्रकारिता का मूल्य अच्छी तरह पता है, यही वजह है कि इन काल्पनिक किरदारों की दूसरी जिंदगी पत्रकारिता रही है। उन लेखकों को भी ये एहसास था कि पत्रकार ही ऐसे हैं, जो लोगों से सीधे जुड़े होते हैं, बिना स्वार्थ के, बिना किसी लाग लपेट के। सार ये कि पत्रकारिता हमेशा से ही समाजसेवा रही है और पूंजीवादी दौर में इसका स्वरूप यही रहने वाला है।

फिल्में समाज का आइना होती हैं और समाज को भी इस क्षेत्र से काफी उम्मीदें हैं। हिंदी सिनेमा ही नहीं, दुनिया भर की फिल्म इंडस्ट्री में जर्नलिज्म रोचक विषय रहा है। ‘ब्रूस अलमाइटीज् हॉलीवुड की हिट फिल्म है। इसमें एक पत्रकार की दशा-दुदर्शा की कहानी है। कहानी काल्पनिक है कि भगवान आते हैं और अपनी शक्ति उसे देकर दुनिया चलाने को कहते हैं, पर बाद में जिम कैरी रूपी पत्रकार अपने सामाजिक दायित्यों को समझता है। यहां भी फिल्मकार ने अपनी बात कहने के लिए पत्रकार को ही चुना है। हिंदी फिल्में भी जर्नलिज्म से अदूती नहीं हैं। पहले फिल्मों में पत्रकार का किरदार हुआ करता था, लेकिन अब मीडिया पर ही फिल्में बनने लगी हैं। ‘पेज थ्रीज् में मधुर भंडारकर ने पत्रकारिता को करीब से दिखाया है। ‘बीट पत्रकारिताज् में ग्लैमर की चकाचौंध तो दिखाई है ‘क्राइम रिपोर्टिगज् के रूप में प्रोफेशन और समाज सेवा का कड़वा सच भी उजागर किया है। इस फिल्म के जरिए भी यही दिखाने की कोशिश की गई है कि पत्रकार का पहला धर्म उसका प्रोफेशन, ईमानदारी, सच्चाई और समाजसेवा हेाता है।

दरअसल, पूंजीवादी पत्रकारिता में ये चीजें थोड़ी पीछे छूटती जा रही हैं। खबरों की ऐसी मारा-मारी होती है कि पत्रकार अपना धर्म भूल जाता है। कभी कोई एक्सीडेंट होता है तो अब भीड़ के साथ पत्रकार भी उसे नजरअंदाज कर देता है या खबरों तक ही सीमित रह जाता है। समाजसेवा का धर्म यहीं डगमगाने लगता है। माना कि रियल लाइफ फंतासियों से भरी नहीं होती और आप उड़कर सुपरहीरो की तरह किसी को बचा नहीं सकते, पर खबरों को कवर करने के साथ-साथ किसी घायल को अस्पताल तो पहुंचा ही सकते हैं। अगर हम भी नजरअंदाज करके आम लोगों की तरह हाथ पर हाथ धरे खड़े रहें तो फिर उस भीड़ से अलग कैसे हुए।

ये बात इसलिए, क्योंकि ये सिर्फ पेशा नहीं है, धर्म भी है और अगर लोग इस धर्म के प्रति आस्था न रखते तो वो अपनी फिल्मों और किरदारों को पत्रकारों के रूप में इतनी अहमियत न देते। अपेक्षाएं बढ़नी लाजिमी हैं और ऐसे समय में आप अपेक्षाओं को तोड़ भी नहंी पाते। फिल्मों के जरिए ही सही एक बात समझने की जरूरत है कि इस क्षेत्र के प्रति अभी भी लोगों का विश्वास है। पत्रकारों को बुद्धिजीवी समझा जाता है और वो हैं भी, इसलिए बहकते कदम संभालने की जरूरत है।

फिर फिल्मों पर ही आते हैं। हाल ही में राम गोपाल वर्मा ‘रणज् फिल्म लेकर आए थे। मीडिया मैनेज की जो तस्वीर रामू ने दिखाई, वो उनका सच हो सकता है, पर पत्रकारिता जगत के लिए ये सच घातक है। फिल्म आखिर में यही संदेश दिया गया है कि ये समाज सेवा से जुड़ा क्षेत्र है और इस धर्म से अलग हुआ भी नहीं जा सकता। मीडिया का मतलब ही है मीडियम यानी माध्यम। जनता के बीच जाने का, उनका सुख-दुख जानने और उससे निजात दिलाने के तरीकों को सामने रखने का। मीडिया के पास भी जनता की ताकत है और ये ताकत किसी सुपरहीरो की ताकत से कम नहीं है।

धर्मेद्र केशरी

कॉपी एडिटर आज समाज दैनिक

Thursday, December 10, 2009

कभी हो प्यार..पुकार लेना

जब आती हैं दूरिया
तब होता है एहसास

प्यार का

उन जज्बातों का

जिनसे खेल बैठे कभी

आज वो दूर हैं

कहते हैं प्यार नहीं तुमसे

है यकीं प्यार आज भी है

सोचा न था ये दिन भी आएगा

वो नजरें यूं चुराएंगे

जसे गैर हों हम

गैर तो हमसे भले

भूल से ही सही, इनायत तो करते हैं

पर हम तो दूर हैं!

फासला शहरों का होता तो सह लेते

फासला मजहब का होता तो सह लेते

फासला जन्मों का होता तो उफ न करते

पर दूरियां तो दिलों की हैं

उन्हें कैसे ये समझाऊं

के दूरियों पर सिसक रहे हैं हम

और भी करीब हो रहे हैं हम

चाहा तो कई बार उनसे ये कह दूं

कह दूं कि जिंदगी पे तुम्हारा ही हक है

पर जानता हूं

वो नहीं चाहते साथ मेरा

फिर जिंदा रहूं या उनका नाम लेके मर जाऊं

मरने से पूरी होती गर ये सजा

तो जान देने से डरता ही कौन है?

लेकिन एक अहसास बाकी है, एक उम्मीद बाकी है

के वो रूबरू होंगे हमसे

जब होंगे रूबरू तो पूछूंगा एक सवाल

सजा का हकदार बेशक हूं

पर इतना बुरा हूं?

डरता भी हूं

कहीं जज्ब रह न जाए ये सवाल

न जाने तुम पूछने का मौका दो भी या नहीं!

उन नादानियों का क्या करूं

जो आ गईं आड़े

नादानियों को क्यों कोसूं, जिम्मेदार तो में ही हूं

सच में, सजा का हकदार बेशक मैं ही हूं

यकीं दिलाऊं भी तो कैसे, पास आऊं भी तो कैसे?

जिन दरवाजों को था कभी तुमने खोला

आने दिया अंदर, दिल के मकां में

अब तो खिड़कियां भी बंद हैं

रोशनदानों पर लगी हैं कांच की मोटी परत

झांक सकता हूं, पर कुछ बयां कर नहीं सकता

नहीं चाहता वो कांच भी टूटे

शीशे सा दिल तोड़ा था तुम्हारा

कांच टूटेगा, तो इल्जाम मुझपर ही आएगा

खुश हूं तुम्हारी खुशियों को देखकर

तुम छोड़ना चाहो, तुम भूलना चाहो

रोकता कौन है!

आजाद हो

करके देख लो

दूर तो हैं ही और भी दूर करके देख लो

पर हम तो जिंदा रहेंगे

क्योंकि हर लम्हा मरना है

मौत तो पल भर की हकीकत है

नसीब वो भी नहीं

क्योंकि हर लम्हा जो मरना है

सिखा के प्यार भूल बैठे हो हमें?

भूल मेरी थी या है तुम्हारी, इंसाफ तुम ही करो

हम तो इंतजार के दामन में उम्र काट देंगे

वक्त का भी क्या अजीब खेल है

जागे तब, जब मुट्ठी में रेत है!

ये तुम्हें भी पता है, टूट कर चाहता हूं तुमको

नादानियां थीं मेरी

झुका के सिर, कबूल करता हूं

पर क्या इतना ही प्यार था?

जो यूं मुंह फेर लिया

अपना बनाने के बाद, सरे राह छोड़ दिया

न समझना कि ये शिकायत है

हंस के कबूल तुम्हारी हर खुशी

ये तो हैं इस नादान दिन के सवाल

जो हर वक्त मुझसे पूछता रहता है

जीते हैं लोग, हम भी जी लेंगे

पर जिंदा लाश देखना हो

तो दर पे आ जाना

तुम्हें तो पता था कि हमनवाज हो मेरे

फिर भी जाने दिया उस खाई में?

आज भी महसूस करता हूं तुमको

तुम्हारे नर्म हाथों को तुम्हारी मुस्कराहट को

भूल सको तो भूल जाओ, तुम्हें भूलना मेरे वश में नहीं

मुमकिन है कि वक्त बदलता रहे, नामुमकिन भुलाना तेरी याद है

जीना सिखाया तुमने, इंसां बनाया तुमने

कब मुहब्बत से खुदा बन गए

खुद भी न जान पाए

बांध सका है कोई, जो मैं बांधूंगा

पर जब भी कभी याद आए

पुकार लेना

वैसे ही पाओगे, जिस हाल में छोड़ा था

पर हां,

पुकार लेना

मरने से पहले

जीना चाहता हूं तुम्हारे साथ।

धर्मेद्र केशरी

सत्रह का गुणा-भाग

सत्रह साल ने आम आदमी को जबरदस्त प्रभावित किया है। सत्रह साल में बहुत कुछ बदल गया। दस रुपए किलो बिकने वाली दाल सौ रुपए पहुंच गई। दो रुपए किलो बिकने वाला आलू तीस रुपए पहुंच गया। दस रुपए किलो बिकने वाली चीनी चालीस रुपए पहुंच गई। चूल्हा हर आम आदमी से दूर होता जा रहा है, पर कमबख्त पेट की आग वैसी ही है। कितनी बार इसे समझाया कि ज्यादा तड़फड़ाया मत कर, पर इसकी पूजा तो करनी ही पड़ेगी। नतीजा ये कि आज हर कोई सिर्फ ‘दाल-रोटीज् कमाने की जुगत में लगा हुआ है। सच तो ये है कि सत्रह साल बाद ‘दाल-रोटीज् भी नहीं नसीब हो रही है। बहुत कुछ बदल गया इन सत्रह सालों में। इंसान बदल गया पर एक रंग नहीं बदला।

सफेदपोश आज भी वैसे ही हैं, जसे सत्रह साल पहले थे। उन्हें इस बात का मलाल ही नहीं कि उन्होंने सत्रह साल पहले चार सौ साल पुराने प्रतीक को सुनियोजित तरीके से ढहा दिया। बात आई-गई भी हो गई, क्योंकि साल दर साल लोगों को अपने पेट और भविष्य की चिंता सताती रही, बीते को भुला रहे थे, पर सत्रह साल आम आदमी पर भारी पड़ गए। जिसका निपटारा बरसों पहले हो जाना चाहिए था, वो फाइल आज खुली वो सिर्फ सियासी फायदे के लिए। सत्रह सालों ने आम आदमी के पेट पर एक बार फिर लात मार दी।

मुआं ये मुद्दा न होकर वोट कतरने वाली कैंची हो गई, जो लोग कचकचा के चला रहे हैं। खुद को जनता के सेवक कहने वाले ये लोग भूल गए कि धीरे-धीरे ये देश भुखमरी की कगार पर पहंच रहा है। वो ये भूल गए कि महंगाई अपने चरम पर है और आम आदमी इस बोझ से उबर नहीं पा रहा। लक्जरी गाड़ियों में घूमने वाले ये भूल गए कि आम आदमी का सफर महंगा हो गया है। वो अशिक्षा भूल गए, बेरोजगारी भूल गए, लोगों का दुख दर्द, सारी परेशानियां भूल गए। मंदी भूल गए, जिसकी मार न जाने कितनों पर पड़ चुकी है और वो दरबदर फिर रहे हैं।

याद आया तो सत्रह सालों बाद वही पुराना मंदिर और मस्जिद, जिन्हें जनता भूलना चाहती है। याद भी आया तो सिर्फ नसीहत बनकर, सजा का दूर-दूर तक कोई नामलेवा नहीं। इस एक मुद्दे ने सभी मुद्दों की हत्या कर दी। ऐसा मुद्दा जिसका कोई हल नहीं निकलना है, उल्टा उन्माद बढ़ेगा सो अलग, पर इन सफेदपोशों को सिर्फ त्रिशूल और चांद तारा दिखाई पड़ रहा है। सत्रह सालों में आम आदमी बौना होता गया, इस पर कोई ध्यान देने वाला नहीं। आखिर क्यों हैं ये देश ऐसा कि यहां नफरत के सौदे में फायदा ढूंढ़ते हैं लोग और विकास, प्यार, संभानाएं हैं कोसो दूर।

धर्मेद्र केशरी

पाकिस्तान जी,

काफी दिनों से आपको एक पत्र लिखने का मन कर रहा था। आज मन को रोक नहीं पाया और आपके नाम पाती लिखने बैठ गया। आप सोच रहे होंगे कि आपके नाम के आगे प्रिय या कुछ और क्यों नहीं लिखा, तो आप न तो प्रिय कहलाने के लायक हैं और न ही दोस्त। आप ही बताइए क्या करता, झूठी दोस्ती तो मैं निभाने से रहा। आपके घर में इन दिनों रोज बम ब्लास्ट हो रहे हैं। हम कुछ नहीं कहने वाले आपका निजी मामला है।



आप चाहें तो अपनी जनता को खुश रखें और आप चाहें तो उनकी बलि चढ़ाते रहें। ये आप पर निर्भर करता है कि शांति चाहते हैं या बेगुनाहों की मौत। आपने दुश्मनी किस बात पर ठान रखी है। क्या ये सार्वभौमिक सत्य आपकी समझ में नहीं आता कि इस युग में क्या युगो-युगांतर तक हिंदुस्तान का बाल भी बांका नहीं कर सकते हैं। हां, अपनी ओछी हरकतों से परेशान जरूर कर सकते हैं, जसा कि मुंबई हमले के दौरान देखने को मिला।



आपकी आत्मा जानती है कि मुंबई के गुनहगार कौन हैं और कौन है असली अपराधी, फिर भी आप आंखें मूंदें बैठे हैं। न ही चैन से जीते हैं और न ही चैन से जीते देखना चाहते हैं। जरा आंखें खोलिए, बिना समस्या के समस्या पैदा करने के बजाय अपने देश की प्रगति पर ध्यान दें तो बेहतर है। बहुत कुछ है करने को आतंकवाद फैलाने के सिवा। नाम पाकिस्तान हरकतें नापाक। दुनिया भर में तमाम समस्याएं हैं। कुदरत को बचाने पर ध्यान दीजिए, मानवता का साथ दीजिए, दुनिया में अपने देश का झंडा बुलंद कीजिए।



हमारे यहां कहावत है कि जसी करनी वैसी भरनी। शायद आपने ये कहावत नहीं सुनी, सुनी भी है तो नजरअंदाज करना आपके खून में है, इसलिए अपने घर में मची मार-काट को भी आप खुली आंखों से नहीं देख पा रहे हैं। आंखें खोलिए, कहीं ऐसा न हो कि आपकी इतनी मट्टी पलीद हो जाए कि कहीं मुंह दिखाने के काबिल न रहें। हम तो गांधी जी के रास्ते पर चल रहें हैं, इसलिए अभी चुप हैं। यही कहना है कि चंद्रशेखर आजाद की याद न दिलाएं। आप अपनी हरकतों से बाज नहीं आएंगे।



धर्य की भी एक सीमा होती है। अब उस सीमा को न लांघें तो आपके लिए अच्छा है। बिगड़े अगर सुधरता नहीं है तो यहां सुधारने वाले बहुतायत हैं। और क्या कहूं फिलहाल यही चाहता हूं कि अगली बार जब आपको पत्र लिखूं तो खुशी-खुशी पाकिस्तान के आगे प्रिय या दोस्त जरूर लगाऊं। बाकी आपकी मर्जी।

धर्मेद्र केशरी

Monday, November 16, 2009

प्रोफाइल के फेर में फंसी मीडिया

इस बार मैं अपने गृहनगर इलाहाबाद से कुछ सवालों को लेकर लौटा, कुछ ऐसे सवाल, जिनका जवाब जानते हुए भी मैंने चुप रहना ही बेहतर समझा। जब भी घर जाता हूं, मीडिया में होने की वजह से लोग मीडिया के बारे में कुछ न कुछ चर्चा जरूर करते हैं। मेरा एक दोस्त है, वो इस बार एक सवाल पर अड़ गया। हुआ यूं कि कुछ दिन पहले ही एक ग्रामीण महिला को उसके ससुराल वालों ने जलाकर मार डाला था। बात न थाने तक पहुंची और न ही उसके आगे, क्योंकि उसके मुताबिक सबकुछ ‘मैनेजज् कर लिया गया था। महिला साधारण घर की थी। ये पहला वाकया नहीं था, बल्कि और भी कई ऐसी घटनाएं हो चुकी थीं। वो चाहता था कि मैं इस मुद्दे पर कुछ करूं। पर मैं उसके लिए चाहकर भी कुछ नहीं कर पाया।
वो इसलिए कि इस व्यक्तिगत मुद्दे पर तो मैं लड़ सकता था, पर न जाने कितनी ऐसी घटनाएं लगातार होती रही हैं और होती भी रहेंगी और ये मेरे सामथ्र्य से बाहर होगा कि मैं वहां भी अपनी जिम्मेदारी निभा सकूं। वो जिद करता रहा और मैं उसे टालता रहा। आखिरकार उसने पूछा कि उस ग्रामीण महिला को इंसाफ क्यों नहीं मिल सकता? क्या करती है तुम्हारी मीडिया ऐसी घटनाओं पर। किसी रईस के घर में ऐसी घटना होती, क्या फिर भी तुम लोग आवाज नहीं उठाते?

जवाब उसके सवाल में ही था, फिर भी मैं चुप रहा। जवाब भी देता तो क्या कि हमारी मीडिया भी खबरों की परख करती है। टारगेट व्यूवर या रीडर घटना से ज्यादा मायने रखता है। अगर वो ग्रामीण महिला न होकर किसी रसूखवाले के परिवार की सदस्य होती तो चैनलों और कैमरों का जमावड़ा लग जाता। कई चैनल तो उसे इंसाफ दिलाकर ही सांस लेते और तब तक दिखाते, जब तक सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंगती। मैं अपने दोस्त को ये बात कैसे समझाऊं कि जिस मीडिया को वो लोकतंत्र का चौथा खंभा मानता है, वो भी टीआरपी के फेर में फंसी है।

कैसे समझाऊं कि वो ग्रामीण महिला चैनलों की उपभोक्ता नहीं थी। उसे तो ये भी नहीं पता होगा कि समाचार चैनल या अखबार क्या होते हैं। अगर वो महिला खबरिया चैनल की उपभोक्ता होती तो शायद उसकी मौत के लिए जिम्मेदार लोगों को सलाखों के पीछे करने की मुहिम चलती और लोग उसके लिए भी इंडिया गेट पर मोमबत्तियां जलाते। देश में चंनिंदा मुद्दों को ही मीडिया घेरती है। मनु शर्मा के पैरोल का मुद्दा, निठारी कांड, आरुषि मर्डर पर कुछ भी होता है तो ब्रेकिंग न्यूज चलते हैं और कई पन्ने समर्पित कर दिए जाते हैं। गलत तो गलत होता है और हम यहां अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह कर रहे हैं, पर क्या सच में हम ईमानदारी से अपने सरोकारों पर खरा उतरते हैं? इन मुद्दों की खास बात ये है कि इनका संबंध धनाढ्य परिवारों से है।

देश में ऐसी तमाम घटनाएं होती हैं, पर मीडिया उन्हें क्यों पचा ले जाती है, क्योंकि वो ‘लो प्रोफाइलज् होती हैं। ये सच है कि ये बड़ी घटनाएं हैं, जिनका समाज पर असर पड़ता है, पर हम ये क्यों भूल जाते हैं कि अगर सच्चाई और इंसाफ की बात ही है तो हम उस ग्रामीण महिला को न्याय दिलाने के लिए मुहिम चला सकते थे। उस खबर का समाजिक संदेश तो और भी दूरगामी होता, क्योंकि हाइ प्रोफाइल मामलों में एक बार पैसों के बल पर खिलवाड़ भी हो सकता है, पर ग्रामीण महिला को मिला इंसाफ कई घरों को सुधार सकता था। लोग किसी को जलाने और जान से मारने से डरते, क्योंकि गांवों में शहरों से ज्यादा लोग कानून के डंडे से डरते हैं।

ये सामाजिक संदेश भी होता और लोग मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल भी नहीं उठाते। मीडिया में लोगों का यकीन बहुत ज्यादा है, उन्हें विश्वास है कि मीडिया आम लोगों के हितों के लिए हमेशा आगे आती रही है, पर हम दिलचस्प और बड़ी खबरों के चक्कर में कहीं न कहीं अपने ट्रैक से उतरते जा रहे हैं। कृषि प्रधान देश हिंदुस्तान में किसानों की समस्याएं बहुत ज्यादा हैं, पर विडंबना है कि बिना किसी किसान के आत्महत्या किए या कोई बड़ा बवाल हुए उन पर ध्यान दिया जाता हो। अगर ध्यान भी दिया जाता है तो वो चंद बुलेटिन और कुछ लेखों तक ही सिमट जाता है, कोई इस मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए आगे नहीं आता।

देश में कितनी कलावती होंगी, जिनके बच्चे भूख से तड़पकर कई रातें गुजारते होंगे, पर राहुल गांधी के कलावती जिक्र के बाद ही उसकी गरीबी भी लोगों को दिखी। मैं अपने उस दोस्त को इन सच्चाइयों से कैसे रूबरू कराता, जो मेरे मन को भी सालते हैं। हम तो अभी तिनके हैं, पर मैं अपने उस दोस्त के सवाल का क्या जवाब दूं, ये मैं अपने आदरणीय वरिष्ठों से पूछना चाहता हूं। उसका सवाल अपने मीडियाकर्मी दोस्तों से करना चाहता हूं कि मुङो उसके सवाल का क्या जवाब देना चाहिए था।

धर्मेद्र केशरी

Saturday, October 24, 2009

देशद्रोही

देशद्रोही की परिभाषा क्या होती है। जो देश के हित के खिलाफ हो। जो देशवासियों के दिलोदिगमाग पर विपरीत असर डाले और जिसकी वजह से देश की संस्कृति और अस्मिता पर खतरा पैदा हो। जरूरी नहीं कि सिर्फ आतंकवाद फैलाकर या हिंसा का सहारा लेने वालों को देशद्रोही समझा जाए। वो लोग भी देशद्राहियों की श्रेणी में आते हैं, जो कानून की आड़ में, मनोरंजन के नाम पर देश की अस्मिता को ठेस पहुंचाते हैं। मनोरंजन के नाम पर परोसे जाने वाले कार्यक्रम, जिनमें अश्लीलता कूट-कूट कर भरी हो, भारतीय सभ्यता के हिसाब से वो भी देशद्रोह ही है।

इन दिनों रियलिटी कार्यक्रमों का बोलबाला है। बदलाव की इस बयार का खुले दिल से स्वागत किया जाना चाहिए, पर चैनल मनोरंजन के नाम पर अपना विश्वास खोते जा रहे हैं। पिछले दिनों अमेरिकन कांसेप्ट के हिंदी संस्करण ‘सच का सामनाज् का विरोध इसलिए हुआ, क्योंकि शो को रोचक बनाने के लिए ऐसे सवालों की बौछार की जा रही थी, जो दर्शकों के हित में नहीं था, समाज के हित में नहीं था। इन दिनों ‘बिग बॉसज् भी उसी ढर्रे पर चल रहा है। टीआरपी और कमाई के चक्कर में सामाजिकता और संस्कृति के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। कमाल खान के अलावा शो के अन्य प्रतियोगियों के कई क्रिया कलाप लोगों के गले नहीं उतर रहे हैं। आखिर कौन है देशद्रोही, क्यों दे रहे हैं लोग इन देशद्रोहियों को तवज्जो। नजर डालते हैं कुछ ऐसे ही किरदारों पर।

देशद्रोही नंबर 1-कमाल खान
सच ही कहते हैं लोग कि रुपहले पर्दे की दुनिया सच से कोसों दूर है। कमाल खान उन्हीं लोगों में हैं। पिछले साल इनकी एक फिल्म आई थी ‘देशद्रोहीज्। फिल्म में कमाल साहब ने देशप्रेम और प्यार का पाठ पढ़ाया था। पाठ कम पढ़ाया था, मराठी और गैर मराठी विवाद के सहारे लोकप्रियता के सही समय पर चोट की थी। गरम लोहे पर हथौड़ा मार रहे थे कमाल खान। लोगों की नजर में कमाल सच्चे देशभक्त बनते दिखाई पड़े थे, पर सच्चाई कुछ और ही है। दुनिया को प्यार और अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले कमाल खान का असली रूप सभी ने देख लिया है। अड़ियल, बिगड़ैल, घमंडी और भी न जाने क्या-क्या। ये हमारी राय नहीं, बल्कि कमाल के करतूतों की सच्चाई है। ‘बिग बॉसज् में अपनी ब्रांडिंग के लिए कमाल खान ने मानवीयता को भी ताक पर रख दिया। सभी को पता है कि उन्हें गालियां आती हैं, लेकिन कमाल ने अपनी इस विशेषता को पूरे देश के सामने दिखाया है कि उन्हें कितनी गंदी-गंदी गालियां आती हैं। देशप्रेम का पाठ पढ़ाने वाला ये शख्स भूल गया कि उनके निंदनीय कारनामे देशद्रोह की श्रेणी में आते हैं। अब किस मुंह से ये देशप्रेम की कहानी सुनाएंगे और लोगों को इन पर क्यों यकीन करना चाहिए। कमाल ये भूल गए कि वो अप्रत्यक्ष रूप से सिर्फ अपने बारे में ही नहीं, कइयों की विश्वसनीयता और शख्सियत पर सवाल उठा रहे हैं।

देशद्रोही नंबर 2- कलर्स चैनल
इस चैनल को शुरू हुए एक साल का समय बीता है, लेकिन कम समय में ही ये दर्शकों का चहेता चैनल बन बैठा है। इसकी वजह भी है, इस चैनल पर कई ऐसे सीरियलों का प्रसारण होता है, जो सामाजिक दृष्टि से काबिलेतारीफ है। ‘उतरनज्,‘न आना इस देश लाडोज्,‘बालिका वधूज्,‘भाग्यविधाताज् कुछ ऐसे धारावाहिक हैं, जो आडंबरों और कुरीतियों पर चोट करते हैं। अपने इस प्रयास से चैनल ने लोगों का दिल जीता है, इसमें कोई शक नहीं, पर जिस तरह से ‘बिग बॉस 3ज् में कमाल के आपत्तिजनक बर्ताव का खुलेआम प्रसारण किया गया है, वो चैनल की विश्वसनीयता और इसकी नीयत को भी कठघरे में खड़ा करता है। जब ‘बालिका वधूज् या ‘न आना इस देश लाडोज् का प्रसारण होता है तो ये टीवी की पट्टी पर लिखते रहते हैं कि वो नारियों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों का पुरजोर विरोध करते हैं। यहां उनकी पीठ ठोंकनी होगी कि वो स्त्रियों पर होने वाले अत्याचारों का खुलासा कर रहे हैं, पर कमाल खान की गंदी गालियों के प्रसारण को क्या कहा जाए। क्या ये इनकी दोहरी नीति का प्रमाण नहीं है! महज टीआरपी के चक्कर में संस्कृति का खिलवाड़ नहीं हो रहा है। जसा कि सभी जानते हैं कि ये लाइव शो नहीं है, लिहाजा उन गालियों को बीप करने के बजाय हटाया जा सकता था, लेकिन नहीं टीआरपी की अंधी दौड़ में चैनल वालों ने इसे बेचने की पूरी कोशिश की है। चैनल वाले ये खुद देखें कि गालियों को बीप करने के बाद भी वो समझ में आती हैं या नहीं या गंदे इशारों को लोग समझ रहे हैं कि नहीं। चैनल के कर्ता-धर्ताओं को ये अच्छी तरह पता है कि ये गलत है, पर कमाई की पट्टी ने आंखें बंद कर रखीं हैं।

देशद्रोही नंबर 3- बख्तयार ईरानी
वैसे तो बख्तयार ईरानी घर के सदस्यों के लिए लड़ते दिखाई देते हैं। वो न्याय का साथ देना चाहते हैं, पर जब वो तनाज से बात कर रहे होते हैं तो वो क्या संदेश देना चाहते हैं। तब वो शायद ये भूल जाते हैं कि उनके परिवार के साथ-साथ पूरा देश उन्हें देख रहा है। उन गालियों को भी और भद्दे इशारों को भी। सभी को पता है कि गुस्से में हर कोई गालियां देता है, पर सरेआम गालियां देना मानवता और शिष्टता की श्रेणी में नही आता है।

द्रेशद्रोही नंबर 4- बिंदू दारा सिंह
ये भी पूरे उस्ताद हैं। गालियां देने में माहिर। पर एक बात समझ में नहीं आती कि बिंदू महाशय अपने घर में भी गंदी गालियों की बौछार करते हैं। अगर नहीं तो वो बिग बॉस में अपनी इस अदा का प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं। उन्हें तो ये समझना चाहिए कि बिग बॉस सिर्फ उनका घर नहीं है या खेल नहीं है, इसके जरिए करोड़ों लोग उन्हें देख रहे हैं। क्या असर पड़ेगा उन पर।

देशद्रोही नंबर -सरकार
सूचना प्रसारण भी ऐसे हालात के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। सरकार अगर चाहे तो ऐसे कार्यक्रमों पर लगाम कसी जा सकती है। पिछले काफी समय से मनोरंजन चैनलों के लिए निगरानी समिति बनाने की बात की जा रही है, पर सरकार यहां भी अपना स्वार्थ देख रही है। वो मनोरंजन चैनलों पर बह रही अश्लीलता को दरकिनार कर मीडिया को अपने हाथों में लेने के लिए ज्यादा प्रयासरत रहती है। सरकार को भी ऐसे कार्यक्रमों पर अंकुश लगाना चाहिए।


देशद्रोही नंबर 6- मीडिया
मीडिया भी संस्कृति पर चोट करने के लिए जिम्मेदार है। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा इसलिए कहा जाता है, क्योंकि लोगों को मीडिया पर विश्वास है। प्रेस पर यकीन है कि बिना डरे हम लोग सच्चाई लोगों तक पहुंचाएं, पर हो रहा है इसका उल्टा। खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। टीआरपी की अंधी दौड़ में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी बेलगाम दौड़ता जा रहा है। जो दिखता है वो बिकता है के मिथक पर टीवी चैनल वाले भी देश की अखंडता पर कम वार नहीं कर रहे हैं। बिग बॉस में प्रसारण के बाद टीवी चैनलों को तो जसे जबरदस्त मसाला मिल गया। वो कमाल खान के बर्ताव को इस तरीके दिखाते रहे, जसे वो नेशनल हीरो हों। क्या ये कमाल को हाइप करना नहीं हुआ। कमाल तो बदनामी से नाम कमाने आए ही थे और वो अपने इस काम में सफल भी हुए।

देशद्रोही नंबर 7- दर्शक
कहते हैं कि अत्याचार करने वाले से अत्याचार सहने वाला ज्यादा दोषी होता है। आखिर दर्शक भी तो ऐसे कार्यक्रमों को मौन सहमति दे रहे हैं। अगर दर्शक एकजुट हो जाएं और विरोध के स्वर तेज करें तो चैनलों की क्या मजाल जो वो अश्लीलता परोसें। ये दर्शकों की सहमति से ही हो रहा है, जो उनके ड्राइंग रूम में उनके परिवार, उनके बच्चों के सामने अश्लील गालियां चल रही हैं।

हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं और देश प्रगतिशील से विकसित की श्रेणी में आने को बेताब है, लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि हम इसकी संस्कृति को ही भुला बैठें। हिंदुस्तान को पूरी दुनिया इसलिए सलाम करती है, क्योंकि यहां की परंपरा अन्य देशों से बिलकुल अलग है। यहां के लोग पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण भी भारतीय मूल्यों के हिसाब से ही करते हैं, इसलिए जब कोई यहां की विरासत को ठेस पहुंचाने का प्रयास करता है तो उसे देशद्रोह की संज्ञा दी जाती है।