Friday, July 30, 2010

कहीं नेताओं, साधुओं सा हाल न हो जाए पत्रकारों का

‘ऐश्वर्या राय को चांद दिखा या नहीं ये ब्रेकिंग न्यूज है, पर हजारों कश्मीरी महिलाओं के पति आज तक घर लौट कर नहीं आए, इस पर कोई खबर नहीं बनतीज्। ये डायलॉग राहुल ढोलकिया की ताजातरीन फिल्म ‘लम्हाज् का है। महज ये संवाद कई गंभीर बातों को सामने लाने के लिए काफी है। मसला कश्मीर का तो है ही बड़ा मसला है मीडिया का, जिसे देश का चौथा स्तंभ कहा जाता है। सिर्फ लम्हा ही नहीं, तमाम फिल्में मीडिया के सच को ‘उजागरज् करने का दावा करने लगी हैं। चाहे वो रामगोपाल वर्मा हों या मधुर भंडारकर या फिर कोई और क्यों अब मीडिया को ही निशाने पर लिया जा रहा है? ये बहुत बड़ा सवाल है।
संविधान के मुताबिक हर किसी को अभिव्यक्ति की आजादी है। कोई भी अपनी बात कहने के लिए स्वतंत्र है। फिल्में भी अभिव्यक्ति को जाहिर करने का माध्यम हैं और फिल्मकार अपने तरीके से लोगों तक अपनी बात पहुंचाते हैं, पर क्या कभी ये गौर किया गया है कि वो ऐसा क्यों कर रहे हैं। कुछ लोग कह सकते हैं कि ये खुन्नस निकालने का तरीका हो सकता है, पर ये बात भी ध्यान देने वाली है कि अनुषा रिजवी जसी पत्रकार भी मीडिया पर व्यंग्य करती हुई फिल्म (पीपली लाइव) बना रही हैं। ऐसा क्यों है कि मीडिया को आईना दिखाने की जरूरत महसूस की जाने लगी है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि पूंजीवादी बेड़ियों में मीडिया कुछ इस कदर जकड़ा जा चुका है कि वो अपने मूल्यों से भी पीछे हटता जा रहा है!
मीडिया पर हर किसी का भरोसा है। इसे आम जन की आकाक्षांओं का प्रहरी कहा जाता है। यही वजह है कि आज मीडिया पर ही सबसे ज्यादा यकीन किया जाता है। लोगों को ये ढांढस बंधता है कि सरकार और नौकरशाह को सही राह पर लाने के लिए मीडिया जनता की आवाज बुलंद करता है और करता रहेगा। जब कोई आप पर विश्वास करता है तो उसके यकीन को कायम रखने के लिए सारे जतन किए जाते हैं। यहां भी कुछ ऐसा ही है। मीडिया को भी अपना भरोसा कायम रखने की जरूरत है, पर दुर्भाग्य से कहीं चूक जरूर हो रही है। आलम ये है कि अब लोग मीडिया को भी गरियाने से पीछे नहीं हट रहे हैं। नेता-अभिनेता के आरोपों से कोई फर्क नहीं पड़ता, पर आम जन अगर मीडिया के बारे में ऐसी राय रखने लगे तो ये पत्रकारिता के मुंह पर बहुत बड़ा तमाचा होगा।
 फिलहाल फिल्मों का उदाहरण दिया जा रहा है। कहते हैं साहित्य या सिनेमा समाज का आईना होता है। पहले की इक्का-दुक्का फिल्मों में ही कहानी की मांग पर किसी भ्रष्ट पत्रकार का किरदार गढ़ दिया जाता था, पर अब..अब तो मीडिया को केंद्र में रखकर कहानी लिखी जा रही है और उन कहानियों में मीडिया का ‘असलीज् चेहरा पेश किया जा रहा है। आखिर ऐसा क्यों है? केवल ये कहकर की फिल्में हैं, काल्पनिकता पर बनती हैं, जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता है।
पूरी दुनिया में, खासकर भारत में मीडिया का प्रभाव इसलिए ज्यादा है, क्योंकि यहां की दीन-दुखी जनता को मीडिया से ही खासी उम्मीदे हैं। ऐसे में जब मीडिया को कटघरे में खड़ा किया जाने लगा है तो आम आदमी किस पर यकीन करे?
पत्रकारों के बिकने और पेड न्यूज पर न जाने कितनी गोष्ठियां और मीटिंग आयोजित हो जाती हैं, पर क्या कोई पूरी ईमानदारी से पेड न्यूज के कल्चर को स्वीकार कर रहा है। गिरेबां में झांककर देखें तो पेड न्यूज की मुखालिफत करने वाले सिर्फ मीडिया की मर्यादा को बचाने के लिए ऐसी बातें कर रहे हैं, पर उनकी आत्मा जानती है कि पेड न्यूज का चलन उनके पास से ही होकर गुजरता है और वो कुछ नहीं कर पाते हैं।
दरअसल, बाजार मीडिया पर बुरी तरह हावी होता जा रहा है, इसलिए कई बार ‘बड़ी खबरेंज् टीवी पर प्रोमो दिखाने के बाद भी उतार ली गई हैं। वजह रसूख के दबाव की हो या माया ने उन खबरों को मुंह बंद कर दिया हो, पर बदनाम तो पत्रकारिता ही हुई है। आखिर मीडिया मैनेज जसे शब्द कहां से निकले हैं। क्या किसी की इतनी औकात है, जो लंच-डिनर कराके और चार पैग दारू पिलाकर या गिफ्ट देकर मीडिया को मैनेज कर सके..पर ये बातें अब आम होने लगी हैं और इसके जिम्मेदार भी हम ही हैं। कुछ घुनों की वजह से गेहूं के अस्तित्व को भी कटघरे में खड़ा किया जाने लगा है और उन घुनों को गेहूं से निकालना बेहद जरूरी है।
बाजार के बढ़ते प्रभाव से हम आम जनता से ग्राहक की तरह पेश आने लगे हैं। जसे दुकान में खबरें लगाकर बैठे हों और ग्राहकों को परोस रहे हों उनकी मनपसंद खबरें। बदलते वक्त में कुछ बदलाव जरूरी है, पर इसका मतलब ये नहीं कि हम अपना रास्ता ही बदल लें।
पत्रकारिता का सीधा संबंध समाज से है और समाज को साथ लेकर ही सार्थकता सिद्ध की जा सकती है। एक सम्मानित और जिम्मेदार कार्य को ‘प्रोफेशनज् में तब्दील किया जा चुका है। ‘प्रतिष्ठानज् पत्रकारिता के आड़े आने लगा है। इसके पीछे कई दलीलें दी जा सकती हैं, कि ये वक्त की मांग है, जमाना बदल चुका है, मीडिया का स्वरूप बदल चुका है वगैरह वगैरह। यकीनन वक्त बदल गया है, मीडिया का चेहरा बदल रहा है, पर जितने भी वरिष्ठ और बड़े पत्रकार हैं, उन्हें उनकी खबरों ने, उनकी रिपोर्टों ने बड़ा बनाया है, लोग सम्मान की नजर से देखते हैं, इसलिए इस बात का खास ख्याल रखे जाने की जरूरत है कि समय कितना भी बदल जाए आम आदमी से सरोकार रखने वाला और उनके दुख दर्द का साझीदार ही पत्रकार है।

एक वक्त था, जब साधुओं को तवज्जो दी जाती थी। उन्हें इज्जत और श्रद्धा के भाव से देखा जाता था। कुछ ऐसा ही हाल नेताओं का था, जिन पर लोग भरोसा करते थे, पर इन लोगों ने अपनी ऐसी मिट्टी पलीद कराई कि पूछिए ही मत। आम जनता तक पैठ बनाने वाले इस तबके को अब सम्मान की दृष्टि से तो नहीं ही देखा जाता है। गालियां मिलती हैं सो अलग, वजह साफ है कि आम आदमी को इन्होंने इस्तेमाल करना चाहा और अपना स्वार्थ सिद्ध किया। बदकिस्मती से मीडिया भी इसी राह पर है। मीडिया पर आंख मूंदकर भरोसा करने वाले लोग (जनता) अब संदेह भी करने लगे हैं। अभी भी वक्त है, मीडिया के साख, सम्मान और मर्यादा को बचाया जा सकता है। कहीं ऐसा न हो कि देर हो जाए और लोग मीडिया पर भी भरोसा करना छोड़ दें।
धर्मेद्र केशरी

Thursday, July 29, 2010

कहां से सीखी ये अदाएं

डियर गर्लफ्रेंड्स,

मेरे पास तो एक भी गर्लफ्रेड नहीं है ये संबोधन उनके लिए है, जिनके ब्वॉयफ्रेंड्स हैं और वो हैं उनकी गर्लफ्रेंड। सभी गर्लफ्रेंड्स से आज एक गुजारिश करना चाहता हूं। प्लीज कुछ बातों पर गौर फरमाया कीजिए। आप लोग किसी के आने-जाने, उठने-बैठने, करने-धरने से पहले टोंकाटाकी करती हैं तो वो आपकी केयरिंग होती है और बेचारे ब्वॉयफ्रेंड्स ने अगर ये पूछा-ताछी कर ली तो वो पजेशिव हो जाता है। एक ही मामले में ये दोहरा मापदंड क्यों अपनाती हैं आप लोग?
फोन बिजी गया नहीं कि मेरी कसम बताना कौन थी फोन पर, भले ही बंदा अपने पापा से बात कर रहा हो। कसमें खा-खाकर सफाई देनी पड़ती है। नखरे, गुस्सा ङोलो वो अलग। अगर कहीं मिस गर्लफ्रेंड्स का फोन बिजी गया और मिस्टर ब्वॉयफ्रेंड्स ने गलती से पूछ भर लिया कि किससे बात हो रही थी तो जमीन-आसमान एक। सीधा सवाब- तुम्हें मुझपर जरा भी भरोसा नहीं, शक करते हो मुझपर। फिर तो बंदे ने जो भुगतना है, उसी की आत्मा जानेगी। कहीं गलती से मिस्टर ब्यॉयफ्रेंड्स ने फोन छेड़ दिया तो कहानी खत्म और मोहतरमाओं का तो बंदे के फोन पर जन्म सिद्ध अधिकार है। डियर गर्लफ्रेंड्स, कुछ बंदे के भावों को भी तो समझा कीजिए।
प्यार की पटरी पर आ रही गाड़ी कब पटरी से उतर जाती है पता ही नहीं चलता। कभी-कभी तो चलती ट्रेन से मुसाफिर बिना बताए भी उतर जाता है। ओ के, दार्शनिक बातें नहीं..सीधे आपसे की जाने वाली गुजारिशों पर आते हैं। हां तो आप लोगों से जब तक मिस्टर ब्वॉयफ्रेंड्स शादी की बात पर नहीं आते हैं रिश्ते को आप सीरियसली नहीं लेती हैं।
बंदा सीरियस हुआ नहीं कि इमोशनल अतयाचार शुरू। वैसे इमोशनल अत्याचार का गुर आपको किस गुरु भाई या गुरु मां ने सिखाया है? प्लीज बताएं, बेचारे ब्वॉयफ्रेंड्स को भी उसी गुरुकुल में भेज दिया जाए ताकि वो आपके प्यार भरे अत्याचारों का उसी अंदाज में जवाब दे सकें। जब मिस्टर ब्वॉयफ्रेंड्स मिस गर्लफ्रेंड्स से शादी जसे गंभीर मसले पर बात करते हैं तो शुरू होती है असली महाभारत।
गर्लफ्रेंड्स जी, प्लीज ये बताएं कि प्यार-व्यार के झमेले में डालने से पहले आप एक कमरे का घर, एक थाली और एक कटोरी में भी गुजारा करने की बात करती हैं। बंदे का जेब और जेब खर्च भी बखूबी जानती हैं और उसी में खुद को सेट कर लेने का हवाला देती हैं, पर बाद में आप स्टेसस का हवाला क्यों देती हैं। फिर आपको अपने मौसी के दामाद जसे पैसेवाले पति की दरकार होने लगती है और प्यार भिखमंगा और नंगा नजर आने लगता है। एक बात और..मिस्टर ब्वॉयफ्रेंड्स आपके नखरे उठाने के लिए उधारी मांगते फिरते हैं, प्लीज इतनी महंगाई और रिसेशन के टाइम में थोड़ा कंसेशन दे दिया कीजिए। बाकी क्या कहें, करना वही है जो आपका मन करेगा। नमस्ते।
धर्मेद्र केशरी

Friday, July 23, 2010

..खो गई हैं

फिर वही शाम वही बत्तियां झिलमिला रही हैं
पर रोशनी कहीं खो गई है
हवा की वही रेशमी छुअन
मगर सिरहन कहीं गुम हो गई है
दूर क्षितिज पर टिकती हैं निगाहें
जहां एक होते जमीं आसमां
इनके मिलन के जसे ही
अपने रिश्ते की बनावट हो गई है
ख्वाहिशें चाहती हैं तोड़ना बंदिशों को
पर अब ख्वाहिशें तोड़ने की आदत हो गई है
चाहता हूं प्यार को प्यार से पाना
पर प्यार में भी अब मिलावट हो गई है
टूटे दिल से अब क्या अरमां करें ऐ दोस्त
अब दर्द में भी राहतें हो गई हैं
यकीन-ए-मुहब्बत न करना टूट के
बेवफाई की वफा पे आहट हो गई है
जार-जार रोता है दिल
पर आंखों की नमी कहीं खो गई है
होता था तेरे होने का गुमां
हुए ऐसे दूर
अब तो रास्ते भी खो गए हैं
न जाने क्या गुनाह किया हमने
कि मिलती रही सजा दर सजा
सोचा था अब सजायाफ्ता नहीं
पर ये कैद बड़ी हो गई है
फिर वही शाम, वही बत्तियां झिलमिला रही हैं
पर रोशनी कहीं खो गई है

Sunday, July 4, 2010

कठपुतलियों का देश!

हमारे देश के प्रधानमंत्री इतने शांत और सौम्य हैं कि वो जहां भी जाते हैं लोग उनके सामने मुख्य मुद्दों को भूलकर उनकी सादगी और सौम्यता की मिसाल देने लगते हैं। कुछ दिन पहले ही वो ओबामा से मिले थे। ओबामा उनके विराट स्वरूप में इस कदर फंसे कि पाकिस्तान और डेविड हेडली की बात करना ही भूल गए। ओबामा ने कहा कि जब सिंह साहब बोलते हैं तो पूरी दुनिया उनकी बात सुनती है। माननीय प्रधानमंत्री भी उनकी बातों में ऐसे डूबे कि उन्होंने एक बार ये नहीं पूछा कि भई, आतंकवाद मुद्दे पर आप क्या कहना चाहते हैं या मुंबई हमले के आरोपी को आप भारत के सुपुर्द क्यों नहीं करते।
न जाने क्यों मुङो अपने बचपन के दिन याद आ जाते हैं। मेरी एक टीचर मैडम थीं। मैं उनकी बात बहुत मानता था। मानता क्या था। उनके इशारों पर ही कदम बढ़ाता था। उन्होंने कह दिया आगे बढ़ो, तो बढ़ गया, उन्होंने कहा कि चुपचाप बैठे रहो, तो अच्छे बच्चे की तरह चुपचाप बैठा रहता था। वैसे मैडम थीं बड़ी अच्छी, उन्होंने ही मुङो स्कूल का मॉनिटर बनवाया था। उस एहसान को मैं भूल तो सकता नहीं था, इसलिए जो मैडम की मर्जी होती थी, वो मेरी मर्जी। कई बार मेरे दोस्तों ने ये कहा कि तू तो मैडम की कठपुतली हो गया है, पर अब उन्हें मैं ये कैसे समझाता कि सारा दान-दक्षिणा तो मैडम का ही है।
उन दिनों मैं अपने दोस्तों को तर्क दिया करता था कि जब चौदह वर्ष तक राम जी का खड़ाऊ राज कर सकता है तो मैं तो जीता-जागता इंसान हूं। मैं भी मैडम की खड़ाऊ लेकर ही राज कर सकता हूं। इसके बड़े फायदे होते थे। फालतू दिमाग नहीं खर्च करना पड़ता था। जो सोचना था मैडम को सोचना था। दिमाग पर जरा भी भार पड़ता नहीं था और मैं स्वस्थ्य, चैतन्य। पर अब ये महसूस होता है कि मॉनिटर होने के नाते मुङो कुछ काम खुद भी करने चाहिए थे, मैडम की बातों को मानने के अलावा। इस देश पर जब खड़ाऊ ने राज किया तब किया, अब उन खड़ाऊओं में कोई जान नहीं।
वैसे कठपुतली मैं पहले भी था। अब भी हूं। मैं क्या, पूरा देश है। तिगनी नाच नाच रहे हैं सब, पर कोई कुछ कह नहीं पाता। टैक्सों का इतना भार लाद दिया गया है निरीह जनता पर कि वो दिन ब दिन उसके नीचे ही दबता जा रहा है। ऊपर से नीचे तक सभी कठपुतली हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि ये कठपुतलियों का देश है। खर, ज्यादा कुछ नहीं कहना। ओबामा आने वाले हैं इंडिया, समोसा खाकर और लस्सी पीकर उसका गुणगान करके चले जाएंगे और हम उन्हें कठपुतलियों की तरह आत्ममुग्ध होकर बस देखते रहेंगे।

धर्मेद्र केशरी

Friday, June 25, 2010

न रहेंगे गरीब,न रहेगी गरीबी

बड़े-बूढ़ों ने कहावतें और मिसालें ऐसे ही नहीं दी हैं। उनके पीछे न जाने कितने ही तर्क छिपे होते हैं। अब जसे कई बार आपने सुना होगा कि न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी कितने काम का है। कितनी बार आपने इस पर अमल किया होगा। सरकारें भी ऐसा करती हैं तो क्या बुराई है। खद्दरधारी बेचारे कभी-कभी देश के दौरे पर होते हैं, चकाचक सूट पहनकर, फिर भी कोई न कोई पीछे से बोल ही देता है गरीबी हटाओ। कुछ कह तो पाते नहीं बेचारे हां, एक कसम खाकर वहां से चलते हैं कि वो अब गरीबी मिटाकर ही रहेंगे। वैसे भी हमारे यहां भूखे नंगे लोग हैं ही किस काम के। भूख से बिलबिलाने की वजह से कोई काम नहीं करते और नंगे रहकर इज्जत खराब कर देते हैं।
ऊपर से पार्टियों का गरीबी मुद्दा बवाल। लिहाजा गरीबी को हटाने के लिए वो कमर कसकर तैयार हैं। गरीबों पर तो हाथ कुछ ज्यादा मेहरबान है। अपने ‘पंजेज् में रखता है बिलकुल। अब गरीबी हटाने के लिए ये लोग न रहेगा बांस.. वाली कहावत चरितार्थ करते हैं तो इसमें बुराई क्या है। न रहेंगे गरीब और न रहेगी गरीबी। इसके लिए सरकार ने पूरी तरह से कमर कस लिया है। अनाजों के दाम, डीजल-पेट्रोल के भाव, चीनी के दाम बढ़ाकर सरकार अपने उसी मकसद को पूरा कर रही है। देखिए दाम बढ़ेंगे, तो लोग खरीद नहीं पाएंगे और जब पेट की जरूरतें भी।
रोटी, कपड़ा और मकान की जरूरतों में फंसे आम आदमी को अब कपड़ा मकान तो मयस्सर नहीं होना, रोटी के भी लाले पड़ गए हैं। ये स्थिति ही ऐसी बना देंगे कि आने वाले दिनों में लोगों को रोटी भी नहीं मिलने वाली। गरीब खत्म तो गरीबी खुद ब खुद खत्म। गरीबों को हटाने के लिए सरकार को ये कदम तो उठाने ही पड़ेंगे। पहले महानगरों से गरीबों को गायब करो। महंगाई इतनी करवा दो कि दस-पंद्रह हजार रुपए वेतन पाने वाले गरीब यहां से रवाना हो जाएं। इससे कम वाले तो खुद ब खुद भाग खड़े होंगे। और क्या।
अगर दिल्ली की ही बात करें तो छोटे-मोटे वेतन वालों की यहां औकात ही क्या है। शीला सरकार दिल्ली को न्यूयॉर्क बनाएगी, फिर न्यूयॉर्क जसी दिल्ली में गरीबों के लिए तो कोई जगह रहने वाली है नहीं। गरीब ऑटोमैटिक गायब। गांवों में तो हालत और भी खराब है। भुखमरी से तंग होकर बेचारे गरीब वहां भी जाएंगे तो भुखमरी की तमाम बहनें उनका स्वागत करने के लिए पहले से वहां खड़ी मिलेंगी। जिसके शिकार गांव के लोग हो ही रहे हैं। सरकार बड़ा सराहनीय कार्य कर रही है। महंगाई बढ़ने से देश का भला ही होने वाला है। गरीबों के खात्मे के साथ ही गरीबी भी मिट जाएगी। फिर न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी।

धर्मेद्र केशरी

Friday, May 28, 2010

डर लगता है..

कभी तुम्हें खोने से डरता था
आज पाने से डर लगता है..
तन्हा होने से डरता था
अब महफिल से डर लगता है..
कभी सब कुछ कह जाता था तुम्हें
आज लब खोलने से डर लगता है..
पास आने की जिद थी कभी
अब तो पास आने से ही डर लगता है..
गुजरती सांसों पर नाम था तेरा
अब तो सांस लेने से ही डर लगता है..
तेरे सजदे में झुकाते थे सिर कभी
मांगा करते थे दुआओं में
खुदा बन गए थे तुम मेरे
अब रब से नजरें मिलाने में डर लगता है..
प्यार इस कदर किया तुझको
कि भूल गए सारा जमाना
ताश के पत्तों से बिखरा वहम मेरा
अब वफा के नाम से भी डर लगता है..
फख्र था जिंदा मुहब्बत पर अपनी
उस मुहब्बत की लाश उठाने से डर लगता है..
किसी अपने ने किया दिल पर ऐसा वार
अनजानों को कहना ही क्या
पहचाने चेहरों से भी डर लगता है..
चाह कर भी नहीं होता किसी पर भरोसा
अब तो यकीं के नाम से ही डर लगता है..
चाहतों की चाह में खाया है धोखा
अब चाहतों को चाहने में डर लगता है..
सोचता हूं पूछूं कई सवाल
प्यार था या था मजाक तेरा
दिल में उतर के किया क्यों दिल से दूर
जवाब दोगे कि नहीं, डर लगता है..
तेरी यादों से लिपटकर जिंदा हैं
छीन न लो यादों को भी, डर लगता है..
बड़ी मुश्किल से साहिल पर आई है कश्ती
अब तो मझधार में जाने से डर लगता है..
कभी तुम्हें खोने से डरता था
आज पाने से डर लगता है..

धर्मेद्र केशरी

Thursday, May 27, 2010

ठंडे बस्ते का बोझ

हूं..तो क्या शुरू किया जाए। शुरू करने से पहले ही डर लगता है कहीं ये भी ठंडे बस्ते में न डाल दिया जाए। मुआ ये ठंडा बस्ता है ही ऐसा। इस देश में दो बस्तों का बोझ बहुत ज्यादा है। एक तो बेचारे स्कूली बच्चों का बस्ता दूसरा सरकार का बस्ता। स्कूली बच्चों का बस्ता दिन ब दिन और भी बढ़ता जा रहा है। ये उम्मीदों का बस्ता है, जो भारी तो है पर भविष्य में उस बस्ते से कुछ न कुछ करामात जरूर होती है, पर सरकार का बस्ता नाउम्मीदी से भरा पड़ा है। हां, गर्मी के दिनों में इसका नाम थोड़ा सुकून देता है।
नाम ही है इसका ठंडा बस्ता। सरकार को ये बस्ता बड़ा प्रिय है। स्कूली बच्चे तो अपना बस्ता खोलकर रोजाना पढ़ाई करते हैं, पर सरकार के ठंडे बस्ते में गई चीजें इतिहास बनकर ही बाहर निकलती हैं। ठंडे बस्ते में जो कुछ भी जाता है बस फ्रीज हो जाता है, तभी तो ये है ठंडा बस्ता। इस ठंडे बस्ते ने न जाने क्या-क्या पचा लिया है। बस्तों में घुसकर बड़े-बड़े मुद्दों का कीमा निकल जाता है। उठते गर्म शोलों को ठंडे बस्ते में जज्ब करने का हुनर सभी सफेदपोश जानते हैं। कहां से शुरू करें। बाबरी मस्जिद विघ्वंस की बात करें या बोफोर्स सौदा। ठंडे बस्ते ने इतने कमीशन की रिपोर्टों और सरकारी योजनाओं को पचाया है कि चंद वाक्यों के इस लेख में उनका नाम भी नहीं लिखा जा सकता। अकेले ठंडे बस्ते की रिपोर्टों को ही प्रकाशित करने के लिए सालों किसी समाचार पत्र का प्रकाशन करना पड़ेगा। सरकार के पास ठंडा बस्ता के रूप में गजब की कचरा पेटी है। तेलंगाना मुद्दा..मुंबई हमले पर कार्रवाई..सिख दंगा..बंबई दंगो पर श्रीकृष्णा कमेटी की रिपोर्ट..नयों में शशि थरूर और मोदी विवाद..ठंडे बस्ते में। आइपीएल घोटाला विवाद..ठंडे बस्ते में। कहां तक गिनाएं।

अब जातिगत जनगणना के मुद्दे को भी सरकार ठंडे बस्ते में डालने का मन बना रही है। वैसे आइडिया मस्त है, जिन पर विवाद हो और फंस रहे हों उनके अपने..जिस मुद्दे पर सरकार फंस रही हो, फालूदा निकल रहा हो, उसे भी डाल दो ठंडे बस्ते में। इस बस्ते की एक खास बात और है। सरकारें भले बदल जाएं, पर ठंडे बस्ते का आकार-विचार वही रहता है। अब अगर कोई इस ठंडे बस्ते पर ही सवाल उठाए तो क्या करेगी सरकार। कोई नया ठंडा बस्ता ढूंढ़ेगी। बेचारी जनता आज तक नहीं समझ पाई कि ये ठंडा बस्ता आखिर रखा कहां जाता है। ठंडे बस्ते के मंत्रालय का मंत्री कौन है। शायद उससे फरियाद करने पर ही कोई हल निकल सके। जो भी हो इस इंडे बस्ते की माया ने सब को भरमा रखा है। मैं तो पहले संपादक जी को धन्यवाद दे दूं कि उन्होंने मेरे लेख को ठंडे बस्ते के हवाले नहीं किया।
धर्मेद्र केशरी