Sunday, July 4, 2010

कठपुतलियों का देश!

हमारे देश के प्रधानमंत्री इतने शांत और सौम्य हैं कि वो जहां भी जाते हैं लोग उनके सामने मुख्य मुद्दों को भूलकर उनकी सादगी और सौम्यता की मिसाल देने लगते हैं। कुछ दिन पहले ही वो ओबामा से मिले थे। ओबामा उनके विराट स्वरूप में इस कदर फंसे कि पाकिस्तान और डेविड हेडली की बात करना ही भूल गए। ओबामा ने कहा कि जब सिंह साहब बोलते हैं तो पूरी दुनिया उनकी बात सुनती है। माननीय प्रधानमंत्री भी उनकी बातों में ऐसे डूबे कि उन्होंने एक बार ये नहीं पूछा कि भई, आतंकवाद मुद्दे पर आप क्या कहना चाहते हैं या मुंबई हमले के आरोपी को आप भारत के सुपुर्द क्यों नहीं करते।
न जाने क्यों मुङो अपने बचपन के दिन याद आ जाते हैं। मेरी एक टीचर मैडम थीं। मैं उनकी बात बहुत मानता था। मानता क्या था। उनके इशारों पर ही कदम बढ़ाता था। उन्होंने कह दिया आगे बढ़ो, तो बढ़ गया, उन्होंने कहा कि चुपचाप बैठे रहो, तो अच्छे बच्चे की तरह चुपचाप बैठा रहता था। वैसे मैडम थीं बड़ी अच्छी, उन्होंने ही मुङो स्कूल का मॉनिटर बनवाया था। उस एहसान को मैं भूल तो सकता नहीं था, इसलिए जो मैडम की मर्जी होती थी, वो मेरी मर्जी। कई बार मेरे दोस्तों ने ये कहा कि तू तो मैडम की कठपुतली हो गया है, पर अब उन्हें मैं ये कैसे समझाता कि सारा दान-दक्षिणा तो मैडम का ही है।
उन दिनों मैं अपने दोस्तों को तर्क दिया करता था कि जब चौदह वर्ष तक राम जी का खड़ाऊ राज कर सकता है तो मैं तो जीता-जागता इंसान हूं। मैं भी मैडम की खड़ाऊ लेकर ही राज कर सकता हूं। इसके बड़े फायदे होते थे। फालतू दिमाग नहीं खर्च करना पड़ता था। जो सोचना था मैडम को सोचना था। दिमाग पर जरा भी भार पड़ता नहीं था और मैं स्वस्थ्य, चैतन्य। पर अब ये महसूस होता है कि मॉनिटर होने के नाते मुङो कुछ काम खुद भी करने चाहिए थे, मैडम की बातों को मानने के अलावा। इस देश पर जब खड़ाऊ ने राज किया तब किया, अब उन खड़ाऊओं में कोई जान नहीं।
वैसे कठपुतली मैं पहले भी था। अब भी हूं। मैं क्या, पूरा देश है। तिगनी नाच नाच रहे हैं सब, पर कोई कुछ कह नहीं पाता। टैक्सों का इतना भार लाद दिया गया है निरीह जनता पर कि वो दिन ब दिन उसके नीचे ही दबता जा रहा है। ऊपर से नीचे तक सभी कठपुतली हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि ये कठपुतलियों का देश है। खर, ज्यादा कुछ नहीं कहना। ओबामा आने वाले हैं इंडिया, समोसा खाकर और लस्सी पीकर उसका गुणगान करके चले जाएंगे और हम उन्हें कठपुतलियों की तरह आत्ममुग्ध होकर बस देखते रहेंगे।

धर्मेद्र केशरी

Friday, June 25, 2010

न रहेंगे गरीब,न रहेगी गरीबी

बड़े-बूढ़ों ने कहावतें और मिसालें ऐसे ही नहीं दी हैं। उनके पीछे न जाने कितने ही तर्क छिपे होते हैं। अब जसे कई बार आपने सुना होगा कि न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी कितने काम का है। कितनी बार आपने इस पर अमल किया होगा। सरकारें भी ऐसा करती हैं तो क्या बुराई है। खद्दरधारी बेचारे कभी-कभी देश के दौरे पर होते हैं, चकाचक सूट पहनकर, फिर भी कोई न कोई पीछे से बोल ही देता है गरीबी हटाओ। कुछ कह तो पाते नहीं बेचारे हां, एक कसम खाकर वहां से चलते हैं कि वो अब गरीबी मिटाकर ही रहेंगे। वैसे भी हमारे यहां भूखे नंगे लोग हैं ही किस काम के। भूख से बिलबिलाने की वजह से कोई काम नहीं करते और नंगे रहकर इज्जत खराब कर देते हैं।
ऊपर से पार्टियों का गरीबी मुद्दा बवाल। लिहाजा गरीबी को हटाने के लिए वो कमर कसकर तैयार हैं। गरीबों पर तो हाथ कुछ ज्यादा मेहरबान है। अपने ‘पंजेज् में रखता है बिलकुल। अब गरीबी हटाने के लिए ये लोग न रहेगा बांस.. वाली कहावत चरितार्थ करते हैं तो इसमें बुराई क्या है। न रहेंगे गरीब और न रहेगी गरीबी। इसके लिए सरकार ने पूरी तरह से कमर कस लिया है। अनाजों के दाम, डीजल-पेट्रोल के भाव, चीनी के दाम बढ़ाकर सरकार अपने उसी मकसद को पूरा कर रही है। देखिए दाम बढ़ेंगे, तो लोग खरीद नहीं पाएंगे और जब पेट की जरूरतें भी।
रोटी, कपड़ा और मकान की जरूरतों में फंसे आम आदमी को अब कपड़ा मकान तो मयस्सर नहीं होना, रोटी के भी लाले पड़ गए हैं। ये स्थिति ही ऐसी बना देंगे कि आने वाले दिनों में लोगों को रोटी भी नहीं मिलने वाली। गरीब खत्म तो गरीबी खुद ब खुद खत्म। गरीबों को हटाने के लिए सरकार को ये कदम तो उठाने ही पड़ेंगे। पहले महानगरों से गरीबों को गायब करो। महंगाई इतनी करवा दो कि दस-पंद्रह हजार रुपए वेतन पाने वाले गरीब यहां से रवाना हो जाएं। इससे कम वाले तो खुद ब खुद भाग खड़े होंगे। और क्या।
अगर दिल्ली की ही बात करें तो छोटे-मोटे वेतन वालों की यहां औकात ही क्या है। शीला सरकार दिल्ली को न्यूयॉर्क बनाएगी, फिर न्यूयॉर्क जसी दिल्ली में गरीबों के लिए तो कोई जगह रहने वाली है नहीं। गरीब ऑटोमैटिक गायब। गांवों में तो हालत और भी खराब है। भुखमरी से तंग होकर बेचारे गरीब वहां भी जाएंगे तो भुखमरी की तमाम बहनें उनका स्वागत करने के लिए पहले से वहां खड़ी मिलेंगी। जिसके शिकार गांव के लोग हो ही रहे हैं। सरकार बड़ा सराहनीय कार्य कर रही है। महंगाई बढ़ने से देश का भला ही होने वाला है। गरीबों के खात्मे के साथ ही गरीबी भी मिट जाएगी। फिर न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी।

धर्मेद्र केशरी

Friday, May 28, 2010

डर लगता है..

कभी तुम्हें खोने से डरता था
आज पाने से डर लगता है..
तन्हा होने से डरता था
अब महफिल से डर लगता है..
कभी सब कुछ कह जाता था तुम्हें
आज लब खोलने से डर लगता है..
पास आने की जिद थी कभी
अब तो पास आने से ही डर लगता है..
गुजरती सांसों पर नाम था तेरा
अब तो सांस लेने से ही डर लगता है..
तेरे सजदे में झुकाते थे सिर कभी
मांगा करते थे दुआओं में
खुदा बन गए थे तुम मेरे
अब रब से नजरें मिलाने में डर लगता है..
प्यार इस कदर किया तुझको
कि भूल गए सारा जमाना
ताश के पत्तों से बिखरा वहम मेरा
अब वफा के नाम से भी डर लगता है..
फख्र था जिंदा मुहब्बत पर अपनी
उस मुहब्बत की लाश उठाने से डर लगता है..
किसी अपने ने किया दिल पर ऐसा वार
अनजानों को कहना ही क्या
पहचाने चेहरों से भी डर लगता है..
चाह कर भी नहीं होता किसी पर भरोसा
अब तो यकीं के नाम से ही डर लगता है..
चाहतों की चाह में खाया है धोखा
अब चाहतों को चाहने में डर लगता है..
सोचता हूं पूछूं कई सवाल
प्यार था या था मजाक तेरा
दिल में उतर के किया क्यों दिल से दूर
जवाब दोगे कि नहीं, डर लगता है..
तेरी यादों से लिपटकर जिंदा हैं
छीन न लो यादों को भी, डर लगता है..
बड़ी मुश्किल से साहिल पर आई है कश्ती
अब तो मझधार में जाने से डर लगता है..
कभी तुम्हें खोने से डरता था
आज पाने से डर लगता है..

धर्मेद्र केशरी

Thursday, May 27, 2010

ठंडे बस्ते का बोझ

हूं..तो क्या शुरू किया जाए। शुरू करने से पहले ही डर लगता है कहीं ये भी ठंडे बस्ते में न डाल दिया जाए। मुआ ये ठंडा बस्ता है ही ऐसा। इस देश में दो बस्तों का बोझ बहुत ज्यादा है। एक तो बेचारे स्कूली बच्चों का बस्ता दूसरा सरकार का बस्ता। स्कूली बच्चों का बस्ता दिन ब दिन और भी बढ़ता जा रहा है। ये उम्मीदों का बस्ता है, जो भारी तो है पर भविष्य में उस बस्ते से कुछ न कुछ करामात जरूर होती है, पर सरकार का बस्ता नाउम्मीदी से भरा पड़ा है। हां, गर्मी के दिनों में इसका नाम थोड़ा सुकून देता है।
नाम ही है इसका ठंडा बस्ता। सरकार को ये बस्ता बड़ा प्रिय है। स्कूली बच्चे तो अपना बस्ता खोलकर रोजाना पढ़ाई करते हैं, पर सरकार के ठंडे बस्ते में गई चीजें इतिहास बनकर ही बाहर निकलती हैं। ठंडे बस्ते में जो कुछ भी जाता है बस फ्रीज हो जाता है, तभी तो ये है ठंडा बस्ता। इस ठंडे बस्ते ने न जाने क्या-क्या पचा लिया है। बस्तों में घुसकर बड़े-बड़े मुद्दों का कीमा निकल जाता है। उठते गर्म शोलों को ठंडे बस्ते में जज्ब करने का हुनर सभी सफेदपोश जानते हैं। कहां से शुरू करें। बाबरी मस्जिद विघ्वंस की बात करें या बोफोर्स सौदा। ठंडे बस्ते ने इतने कमीशन की रिपोर्टों और सरकारी योजनाओं को पचाया है कि चंद वाक्यों के इस लेख में उनका नाम भी नहीं लिखा जा सकता। अकेले ठंडे बस्ते की रिपोर्टों को ही प्रकाशित करने के लिए सालों किसी समाचार पत्र का प्रकाशन करना पड़ेगा। सरकार के पास ठंडा बस्ता के रूप में गजब की कचरा पेटी है। तेलंगाना मुद्दा..मुंबई हमले पर कार्रवाई..सिख दंगा..बंबई दंगो पर श्रीकृष्णा कमेटी की रिपोर्ट..नयों में शशि थरूर और मोदी विवाद..ठंडे बस्ते में। आइपीएल घोटाला विवाद..ठंडे बस्ते में। कहां तक गिनाएं।

अब जातिगत जनगणना के मुद्दे को भी सरकार ठंडे बस्ते में डालने का मन बना रही है। वैसे आइडिया मस्त है, जिन पर विवाद हो और फंस रहे हों उनके अपने..जिस मुद्दे पर सरकार फंस रही हो, फालूदा निकल रहा हो, उसे भी डाल दो ठंडे बस्ते में। इस बस्ते की एक खास बात और है। सरकारें भले बदल जाएं, पर ठंडे बस्ते का आकार-विचार वही रहता है। अब अगर कोई इस ठंडे बस्ते पर ही सवाल उठाए तो क्या करेगी सरकार। कोई नया ठंडा बस्ता ढूंढ़ेगी। बेचारी जनता आज तक नहीं समझ पाई कि ये ठंडा बस्ता आखिर रखा कहां जाता है। ठंडे बस्ते के मंत्रालय का मंत्री कौन है। शायद उससे फरियाद करने पर ही कोई हल निकल सके। जो भी हो इस इंडे बस्ते की माया ने सब को भरमा रखा है। मैं तो पहले संपादक जी को धन्यवाद दे दूं कि उन्होंने मेरे लेख को ठंडे बस्ते के हवाले नहीं किया।
धर्मेद्र केशरी

Friday, April 23, 2010

कोई कुछ भी कहे, फर्क नहीं पड़ता- पायल रोहतगी

पायल रोहतगी। हैदराबाद में जन्मी और मिडिल क्लास से संबंध रखने वाली इस बाला के बारे में किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि इतने कम समय में अपने दम पर वो इस मुकाम पर पहुंच जाएंगी। बॉलीवुड में उनका कोई गॉड फादर नहीं, फिर भी वो इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान के साथ कायम हैं। उन्हें सेक्सी, ग्लैमरस या हॉट हीरोइन कहलाने से कोई फर्क नहीं पड़ता है। पायल को फिल्म इंडस्ट्री की हकीकत पता है और वो प्रैक्टिकली इस सच को स्वीकार भी करती हैं। बिना किसी सपोर्ट के वो अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुई हैं। पायल का फैमिली बैकग्राउंड एकेडमिक है, लेकिन मिस इंडिया प्रतियोगिता में भाग लेने के बाद उनका रुझान पूरी तरह से ग्लैमर वर्ल्ड की ओर हो गया। उन्होंने खुद कंप्यूटर इंजीनियरिंग का कोर्स किया है। पायल हिम्मत हारने वालों में नहीं हैं। अपनी जिंदगी से जुड़ी कई बातों को पायल ने बेबाकी से बयान किया। पेश है धर्मेद्र केशरी की पायल रोहतगी से हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

आपकी इमेज सेक्सी और ग्लैमरस अभिनेत्री की बनी हुई है, इस इमेज से कोई परेशानी नहीं होती?
देखिए, इस इंडस्ट्री में मेरा कोई गॉड फादर नहीं है। न ही मैं सलमान खान की गर्लफ्रेंड हूं और न ही अनिल कपूर की बेटी। कहने का मतलब ये कि बॉलीवुड में ब्रेक पाने के लिए मैंने एक्सपोज का सहारा लिया, इसे मैं कबूल भी करती हूं और सच कहूं तो मुङो इस बात का कतई मलाल नहीं है। मुङो इमेज से कोई फर्क नहीं पड़ता। आपको काम करना है और हर तरह के रोल करने पड़ते हैं। मैंने भी किया है। मेरा काम अभिनय करना है और मैं सिर्फ इस पर ही अपना ध्यान केंद्रित करती हूं, बेवजह की बातों पर ध्यान नहीं देती।

अपनी प्रोफेशनल लाइफ से कितनी खुश हैं?
सबसे पहले मैं बता दूं कि मैं टूटने वाली लड़की नहीं हूं। संघर्ष करना जानती हूं और विपरीत परिस्थितियों में भी अपने आपको संभालना जानती हूं। मैंने भी अच्छी-बुरी फिल्में की हैं और हर कोई अनुभव से ही सीखता है। हर किसी की अपनी किस्मत होती है। दीपिका पादुकोण की अपनी किस्मत है, जो आते ही शाहरुख खान के साथ फिल्म पा गईं। मुङो किसी बात का दुख नहीं है, बल्कि मैं अभी सीख ही रही हूं।

बिग बॉस से आपको कितना फायदा पहुंचा?
बिग बॉस देश का बड़ा रियलिटी शो है और कोई दो राय नहीं कि इस शो से मुङो भी फायदा पहुंचा है। ये बहुत बड़ा प्लेटफॉर्म है। लोग सीधे आपसे जुड़ते हैं। आपकी असली शख्सियत का पता चलता है। शो करने के बाद कम से कम मुझ पर आइटम डांसर का लगा ठप्पा मिट गया। यकीनन शो ने मुङो फायदा पहुंचाया है।

क्या अभी भी कोई रियलिटी शो करने जा रही हैं?
बिग बॉस से बड़ा शो तो फिलहाल कोई नहीं है, इससे बड़ा कोई शो आएगा तो जरूर करूंगी। रही बात किसी अन्य शो में पार्टिसिपेट करने की, तो ऑफर तो मिलता रहता है, पर शो भी तो अच्छा होना चाहिए। हाल ही में मुङो देसी गर्ल के लिए ऑफर आया था, पर मुङो ठीक नहीं लगा। हां, अगर कांसेप्ट अच्छा रहे तो मैं दोबारा रियलिटी शो जरूर करना चाहूंगी।

मान लीजिए, सच का सामना आपको होस्ट करना पड़े तो?
होस्ट करने की बात होगी तो मुङो शो से इनकार नहीं है, लेकिन अगर शो में खुद से जुड़े राज दुनिया के सामने जाहिर करने वाली बात हो तो मैं कभी नहीं करूंगी। मैं उस तरह की लड़की नहीं हूं, जो अपनी निजी जिंदगी, पारिवारिक बातों को भी दुनिया के सामने जाहिर कर दे।

आजकल बेबाक बयान शॉर्टकट का जरिया बन चुका है, कश्मीरा शाह, संभावना सेठ जसी हीरोइनें अपनी बेबाकी से अटेंशन क्रिएट करती हैं। इस पर आपका क्या कहना है?
मेरा इन लोगों से कोई मतलब नहीं है और न ही मैं इनके बारे में कुछ जानती हूं, इसलिए कोई टिप्पएाी नहीं करना चाहूंगी। मैं इन लोगों से अपनी तुलना भी नहीं करना चाहती। जिसको जो करना है करे, मैं सिर्फ अपने बारे में जानती हूं।

कोई खास रोल, जो आप करना चाहती हों?
ऐसा कोई खास ड्रीम रोल नहीं है। मैं यहां सिर्फ अभिनय करना चाहती हूं। तरह-तरह के बेहतरीन किरदारों को निभाने की ख्वाहिश है। मैं सिर्फ फिल्में ही नहीं, थिएटर पर भी अपना ध्यान केंद्रित कर रही हूं। हाल ही में थिएटर के कई वर्कशॉप भी मैंने अटेंड किए हैं। मेरे कहने का मतलब ये है कि यहां मैं काम करने आई हूं और यही चाहतर हूं कि पायल की पहचान भी सिर्फ उसके अभिनय और काम से हो।

आपका एकेडमिक बैकग्राउंड है, खुद आपने कंप्यूटर इंजीनियरिंग की है, ऐसे में हीरोइन बनने का ख्याल कैसे आया?
जी हां, मेरी मम्मी टीचर हैं, पापा भी जॉब में हैं। घर में इंजीनियरों की भरमार है, फिर भी मैंने ग्लैमर वर्ल्ड चुना। ये मेरी पसंद थी। मम्मी-पापा ने मुङो वही करने दिया, जो मुङो अच्छा लगता है। मैं अपने कॉलेज में सबसे लोकप्रिय लड़की थी। ईश्वर की कृपा से सुंदरता और लंबाई मुङो मिली ही है। कॉलेज में सबकी पसंद मैं हुआ करती थी। शोज वगैरह में भी भाग लेती थी। उसी दौरान मैंने फेमिना मिस इंडिया में पार्टिसिपेट किया और मुंबई आना हो गया।

फिलहाल क्या कर रही हैं?
जल्द ही एक फिल्म की शूटिंग शुरू होने जा रही है। फिल्म में मैं एक जर्नलिस्ट का किरदार निभा रही हूं। अभी फिल्म के बारे में ज्यादा कुछ नहीं बता सकती, पर जल्द ही मैं इससे जुड़ी जानकारी आपको दूंगी। वैसे फिल्म की शूटिंग जुलाई-अगस्त तक शुरू हो जाएगी। इसके अलावा कुछ शो भी कर रही हूं।

पायल शादी कब कर रही है?
फिलहाल तो नहीं, क्योंकि मेरा मिस्टर राइट अभी मिला ही नहीं है, जिस दिन मिलेगा शादी भी कर लूंगी।

कैसे हमसफर की तलाश है?
स्मार्ट और हैंडसम तो हो ही, उसे पारिवारिक जिम्मेदारियों की भी समझ हो। मुङो समझने वाला हो, जो कभी किसी चीज के लिए रोक टोक न लगाए। मुङो प्रेरित करे, पर सच कहूं तो ऐसे लड़के मिलते कहां हैं। या तो संकीर्ण मानसिकता के लड़के मिलते हैं या गे (समलैंगिक)।

Monday, April 19, 2010

अलविदा मामा

हैलो, प्रणाम पापाजी
खुश रहो, कैसे हो?

ठीक हूं, आप कैसे है?

हम भी अच्छे हैं, मिर्जापुर जा रहा हूं।

क्यों, दीदी के लिए लड़का-वड़का देखने..

नहीं, तुम्हारे मामा अब इस दुनिया में नहीं रहे, उन्हीं के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए जा रहे हैं।

कब..!

कल रात ग्यारह बजे, आज उनकी मिट्टी मिर्जापुर आने वाली है, तुम्हारी अम्मा भी हैं साथ में, बात करोगे?

दे दीजिए..हैलो अम्मा

हां भैया

अम्मा, मामा नहीं रहे..आप ज्यादा रोइएगा मत

(रोते हुए) हां..

अपना ध्यान रखना अम्मा..पापा देखिएगा अम्मा रोकर अपनी तबीयत न खराब करें।

ठीक है..रखता हूं, बाद में बात करूंगा।

मामा अब नहीं रहे। ये सोचकर आंखों की कोर से आंसू खुद ब खुद ढुलक पड़े। दूर हूं, उनके अंतिम संस्कार में भी जाने से बच गया। उन मामा के अंतिम दर्शन भी न कर सका, जिन्होंने कभी अपनी गोद में खिलाया था, टॉफियां देते थे, खूब लाड़ करते थे। अब वही मामा नहीं रहे। परदेस में रहने का यही फायदा है, सिर्फ कुछ बूंद आंसुओं से ही किसी अपने के लिए शोक व्यक्त कर लेते हैं, क्योंकि हमें तो उन अपनों का अंतिम दर्शन भी नसीब नहीं होना। आंसू बचा लिए मैंने।

Saturday, March 27, 2010

एक प्यार का खत

सच कहते हैं कि लोग प्यार अपने नाम की तरह अधूरा है। अगर अधूरा है तो लाग क्यों करते हैं प्यार। क्यों फंस जाते हैं ऐसे चक्रव्यूह में, जिससे मौत के बाद ही निकला जा सकता है। जब कोई आपकी जिंदगी में सब कुछ बनकर आता है, जब कोई आपके सपनों को पंख लगा देता है, जब कोई आपकी हर सांस में समा जाता है, तो वही शख्स आपसे दूर क्यों चला जाता है? कुछ बातों को जवाब इंसान को खुद ढ़ूढ़ना पड़ता है, पर सवाल ही करने वाला सवाल न करे, तो क्या? दुनिया हसीन बनाने के बाद बीच मझधर में छोड़ने को तो प्यार नहीं कह सकते। महज कुछ गलतियों पर दिल का रिश्ता तोड़ देना कहां तक ठीक है?

ये वो सवाल हैं, जिनका जवाब जिसके पास है, वो देना नहीं चाहता और इन सवालों को मैं उनसे करना नहीं चाहता। सिर्फ इसलिए, क्योंकि उनके हर फैसले पर उनका साथ देने का वादा किया है, फिर इस वादे को कैसे तोड़ सकता हूं। हमेशा से यही चाहत थी और आज भी यही है कि उन्हें दुनिया की हर खुशी नसीब हो, वो सब कुछ मिले, जो उन्होंने अधूरे मन से भी चाहा हो। कहते हैं कि प्यार जताने की चीज नहीं, वो तो महसूस करने की चीज है।

फिर उन्हें क्यों नहीं महसूस होता ये दर्द, ये प्यार, जो सिर्फ उनके लिए ही है। उन्हें लगता होगा कि सब खेल था, वक्त सब ठीक कर देगा। दरअसल, वक्त नहीं ठीक करता, ये आंसू सूख जाते हैं, जब बहते नहीं, तो लोगों को गलतफहमी हो जाती है कि वक्त ठीक कर देता है। इस गलतफहमी ने न जाने कितनों को बर्बाद कर डाला।

खर, किसी का प्यार पूरा हो जाता है, किसी का अधूरा। हम अधूरे वालों की फेहरिस्त में शामिल हैं। हां, दिल से यही दुआ है कि शायद कभी उन्हें प्यार हो तो वो पूरा हो, वो इस दर्द से दूर ही रहें। यही ईश्वर से हमेशा प्रार्थना रहेगी। वो आगे बढ़ें और खुशियां हर कदम पर उनके साथ ही रहें।