Wednesday, February 4, 2009

अमर कहानी

कहते हैं राजनीति बच्चों का खेल नहीं। इसमें कब, कौन, किसको फंसा ले कहा नहीं जा सकता और कब उसी से नाता जोड़ना पड़ जाए जिससे कभी सिर फुटौव्वल की नौबत आन पड़ी थी, यह भी नहीं कहा जा सकता। अब अमर सिंह को ही ले लें। राजनीति के राखी सावंत हैं, कब क्या बोल दें खुद उनको ही नहीं पता होता है। विरोधी कैसा भी हो अमर सिंह अपने बातों के बाण किसी पर भी छोड़ सकते हैं। आश्चर्यजनक बात यह है कि जसे ही उन्हें फायदा नजर आता है बंदे से गिले शिकवे फट्ट से दूर। अब कांग्रेस से सपा के पुराने रिश्तों को ही ले लीजिए।

एक साल भी नहीं बीते होंगे जब अमर सिंह ने उसी विदेशी महिला से दूर रहने की हिदायत दी थी। तब तो सोनिया मैडम पर इल्जाम तक लगा दिया कि अमर सिंह जी की हत्या तक की जा सकती है। हाय रे वक्त, क्या-क्या दिन दिखाता है। सोचा था कभी कांग्रेस से गलबहियां नहीं करेंगे, लेकिन करतूतों ने उत्तर प्रदेश में ऐसी पटखनी दी कि अब माया के डंडे से बचने के लिए कुछ भी करने को तैयार। माया मैडम ने केंद्र से मुंह मोड़ा तो दांत चिंघााड़ कर खड़े हो गए कि हम साथ-साथ हैं। न्यूक्लियर डील से मतलब नहीं, मतलब मौके से है। मौके की दरकार यही कहती है कि अमर एंड पार्टी कांग्रेस के गुण गाने शुरू कर दे और अपना प्यार जताने का मौका न गवाएं। अमर सिंह ने किया भी यही, क्योंकि उनकी राजनीति यही कहती है।

सच तो यह है कि उन्हें डील के नफा-नुकसान से कोई मतलब ही नहीं, खुद का फायदा हो यही काफी है। फिर इतने दिनों से कोई समाजवादी पार्टी का नाम लेवा भी नहीं था। दूर भविष्य तक सूबे में पार्टी के आने की नाउम्म्ीदी से कई सांसादों, विधायकों ने भी नमस्ते करने का मन बना लिया था, ऐसे में अचानक ही खबरों में छा गए। उललू-जूलूल ही सही पब्लिसिटी तो पब्लिसिटी होती है। कुछ तो जड़ों में पानी गया, पानी कहां का था उससे फर्क क्या पड़ता है। खर, राजनीति की इस बेशर्म खेल में अकेले अमर सिंह नहीं हैं जो कभी भी, कुछ भी बोलते रहते हैं, और भी हैं, लेकिन इतना जरूर है कि कोई अमर सिंह के आसपास नहीं फटक सकता।

अब भला राखी सावंत से कोई पार पा सकता है जो अमर सिंह से पाया जा सके। वैसे भी बॉलीवुड से प्रेरित रहते हैं सिंह साहब। अब सपा मतलब, अमर सिंह ही रह गया है, उनकी मर्जी जो होगी करेंगे। यही लोग अब नए राजनीति के कौटिल्य हैं। राजनीति को खेल समझने वाले माहिर खिलाड़ी।

धर्मेद्र केशरी

चालूराम की मुकिल

चालूराम बहुत परेशान हैं। वो उस दिन को कोस रहे हैं जिस दिन उन्होंने पार्टी ज्वाइन कर ली थी। चालूराम सोच रहे हैं कि काश किसी दल विशेष में न घुसा होता तो कुबेर बाबा उसके अकाउंट में घुस गए होते। चालूराम कहीं भी जाते हैं, लेकिन चेहरे पर बारह बजा रहता है। एक दिन उनका एक साथी पूछ बैठा- क्या बात है चालूराम मैं कई दिनों से देख रहा हूं कि तुम ऐसी रोनी सूरत लेकर आते हो जसे मनमोहन सिंह सरकार गिरने की प्रबल आशंकाओं से दुखी रहते हैं। बताओ क्या बात है? चालूराम का मित्र थोड़ा उसके करीब था।

मित्र के बार-बार पूछने से वो टूट गया और अपनी व्यथा सुनाने लगा- यार अच्छा भला मैं चुनाव अपने दम पर जीत सकता था, लेकिन न जाने क्या सूझी कि पार्टी के बैनर तले कूद गया। मित्र ने पूछा तो इसमें परेशानी की क्या बात है, अच्छा ही तो है। मित्र की बात सुनते ही चालूराम बिफर गए, बोले- क्या खाक अच्छा किया, अगर मुङो पता होता कि इस बार लेफ्ट वाले गीदड़भभकी नहीं देकर बल्कि सरकार को लंगड़ी मारने का काम करेंगे तो कब का पार्टी को नमस्ते कर दिया होता। निर्दलीय होता तो मेरी भी बोली लगती, पचासएक करोड़ तो कहीं नहीं गए थे। एक झटके में जिंदगी भर का काम हो जाता। फिर न सीबीआई बैठती न कोई जांच, इससे सुरक्षित डील तो कुछ होती नहीं, ,सरकार खुद पैसे देकर जांच तो बिठाती नहीं।

पूरा पैसा नंबर एक का होता। कोई बेईमानी नहीं। जनता भी कुछ नहीं कहती, बल्कि एहसान जो होता वो अलग। चालूराम का मित्र थोड़ा हैरान होकर बोला- तो इसलिए तुम परेशान हो? खर दल बदलने की तो तुम लोगों की पुरानी आदत है सुना है इस समय दूसरे दल वाले अपनी पार्टी में मिलाने के लिए भी मुंह भर कर पैसा दे रहे हैं, घुस जाओ कहीं और। चालूराम सोचने लगा- नहीं भाई कहीं हमारे दल का नेता प्रधानमंत्री बन गया तो फिर मेरी खर नहीं, पता नहीं कैसे दिन देखने पड़ जाएं। चालूराम दुखी मन से बोले- दोस्त इतना मोटा पैसा हाथ से जाने का दुख मैं ही समझ सकता हूं। इतना कहकर उन्होंने सीने पर हाथ रख लिया। उनके मित्र ने ढांढस बंधाते हुए कहा- तो तुम एक काम करो पैसे अंदर कर लो और कह कह दो कि मैं हूं तो पार्टी का बंदा, लेकिन डील देश के हित में है इसलिए यूपीए को समर्थन देता हूं।

कई लोगों ने ऐसा किया भी है अब बीजेपी के बृजभूषण को ही देख लो, सैद्धांतिक रूप से पार्टी के साथ और व्यावहारिक रूप से यूपीए का हाथ पकड़ा। कौन जानता है सच्चाई? और कोई जानेगा भी नहीं। चालूराम दोस्त की बात सुनते ही मुस्कुराते हुए किसी को फोन करने में जुट गया।

धर्मेद्र केशरी

भारत का बना मशहूर अमेरिकन..

एक दिन मैं बस में सफर कर रहा था। तभी मेरी निगाह एक ठेले पर पड़ी। ठेले पर लगे बोर्ड में लिखा था ‘पंजाब की मशहूर अमेरिकन छल्लीज्। छल्ली भुट्टे को कहते हैं। मैं सोचने लगा कमाल का आदमी है। जब ये पंजाब की मशहूर छल्ली है तो अमेरिकन कैसे हो सकती है। अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए मैं बस से उतर कर ठेले वाले के पास पहुंचा। मैंने पूछा- क्यों भैया यह पंजाब की अमेरिकन छल्ली का राज क्या है, इसका अमेरिका से क्या नाता? ठेले वाला था पूरा होशियार, बड़ शोध के बाद उसने ऐसा लिखा रखा था।

उसने बताया- बाबूजी आगे चलकर जब देश की सभी मशहूर चीजें अमेरिकन होने वाली हैं तो मेरे बोर्ड में लिखाने से क्या फर्क पड़ता है। मैं घोर अचरज में पड़ गया, कहा- जरा खुलकर समझाओगे? ठेले वाला बोला- लो, इसमें समझने वाली क्या बात है। अब अपने यूपीए सरकार को ही देख लो। परमाणु कार्यक्रमों के लिए अमेरिका से समझौता करने जा रहे हैं, आगे चलकर अमेरिका अपने देश पर नजर रखेगा ही। फिर हम जो कुछ भी बनाएंगे, बिजली हो या परमाणु बम, सभी पर लिखा होगा ‘भारत का बना मशहूर अमेरिकन परमाणु बम या मशहूर अमेरिकन परमाणु बिजलीज्। बाबूजी ये देश अमेरिका से बुरी तरह प्रभावित है।

जहां नजर डालोगे वहां उनकी बानगी मिल जाएगी। नेता तो नेता अपने राजदूतों को भी अमेरिका का हर चीज पसंद है। आपको रोनेन सेन याद हैं ना! अमेरिका में भारत के राजदूत, उन लोगों से इतने प्रभावित कि यहां के सांसद हेडलेस चिकेन लगे। खर, अब तो उन्होंने साफ कर दिया कि ऐसा-वैसा कुछ नहीं कहा था, लेकिन अमेरिका से प्रभावित हैं कुछ तो बात कही ही होगी। उनका कसूर भी नहीं, वातावरण का प्रभाव तो पड़ ही जाता है। नेता की तो बात छोड़ो भैया, हमारे यहां के अभिनेता भी वहां से बेहद प्रभावित हैं। आपको न जाने कितने हीरो-हीरोइन मिल जाएंगे जो जताते हैं कि ‘भारत का बना मशहूर अमेरिकन हीरो या हीरोइनज्। अब मल्लिका और ऐश्वर्या जी को ही देख लीजिए, प्योर ‘भारत की बनी मशहूर हॉलीवुड हीरोइनज् बनने की राह पर हैं। मल्लिका के कपड़े तो वैसे ही अमेरिका की झलक पेश करते हैं। मल्लिका ही क्यों, अब तो न जाने कितनी हैं। ऐश के ससुर जी तो भारत का बना मशहूर टूर लेकर अमेरिका में टहल रहे हैं।

ग्लोबलाजेशन का युग है बाबूजी और इस युग में अमेरिका सब पर हावी भी है। कल जब सब कुछ भारत का होने के बावजूद अमेरिका का बना दर्शाना ही है तो आज से ही आदत डाल लेनी चाहिए। इसी देश का अन्न खाता हूं, इसलिए मैंने भी अमेरिका से प्रभावित होकर ‘पंजाब का मशहूर अमेरिकन छल्ली लिखवा दियाज्, कुछ गलत किया क्या बाबूजी! मेरे पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।

धर्मेद्र केशरी

कदम दर कदम उपाय

सरकार का एक बयान आया है। केंद्र सरकार ने कहा है कि वो अमरनाथ मुद्दे पर कदम दर कदम बातचीत करेगी। केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल सहित पूरी सरकार जम्मू के हालात पर चिंतित तो हैं, लेकिन कदम दर कदम उसका समाधान भी ढूंढेंगे। सही बात भी है, कोई भी काम तुरंत तो कर नहीं देना चाहिए खासकर राजनीति में तो कतई नहीं। अगर सरकार ने श्राइन बोर्ड भूमि मुद्दे को तुरंत ही सुलझा दिया तो इतना हो हल्ला कैसे मचेगा। जब हो हल्ला नहीं मचेगा तो पॉपुलरिटी उतनी मिलेगी नहीं। इसलिए सरकार हर कदम फंक-फूंक कर रख रही है।

इस मामले में ही नहीं सरकार लगभग सभी ज्वलंत और विवादित मामलों में कदम दर कदम उपायों को ढ़ूंढती है। सरकार को पता है कि जब कोई विवाद होता है तो पच्चीस-पचास तो मरते कटते ही रहते हैं। इसमें नई बात क्या है। और लड़ाई जब दो संप्रदायों में हो तो हल ढूंढने से ज्यादा वक्त आग में किस तरीके से सियासी राटियां सेंकी जाए, इस तरफ ज्यादा रहता है। सरकार कर भी वही रही है। इस मुद्दे पर मेरे एक मित्र सरकार की इस विचारधारा से सहमत दिखे। उनका कहना है कि अगर हर कोई अपने बारे में सोचता है तो इसमें बुरा क्या है! सरकार भी कोई अनोखी चीज तो है नहीं। जिससे फायदा नजर आ रहा है, वही काम तो कर रही है।

मैंने पूछा, कैसे, तो भाईसाहब बोले- देखो सारा खेल वोटों का है। अमरनाथ मुद्दा सिर्फ जम्मू की बात नहीं है। इससे पूरा देश जुड़ा हुआ है। अब सरकार यह देखेगी कि किधर पलड़ा भारी रखा जाए। अभी तो आजमाइश हो रही है। जसे ही सरकार को लगेगा कि उनका वोट बैंक थोड़ा बढ़ गया है, वैसे ही कोई फैसला सुना देगी। वो बोले- देखो, हड़ताल-वड़ताल सरकार के लिए मायने नहीं रखती। कर्फ्यू तो वैसे भी हमेशा कहीं न कहीं लगते ही रहते हैं, जम्मू में ही सही। राजस्थान में गुर्जर आंदोलन के वक्त नहीं देखा, इस मामले में तो केंद्र सरकार ने कदम दर कदम उपाय खोजने की जहमत तक नहीं उठाई, क्योंकि वहां वोटों की गणित में आगे कोई और था। जम्मू-कश्मीर इतने वर्षो से आतंकवाद का दंश ङोल रहा है, लेकिन आज भी उपाय बस कदम दर कदम ही हो रहे हैं। चाहे 1992 हो या फिर 2008, सरकार तो बस उपायों को ढूंढने में लगी है। वो तब भी मूकदर्शक थी और आज भी उसी हालात में है।

फैसले लेने का दम होना चाहिए और जब सरकार की कुर्सी के चारों टांग गठबंधन के हैं, ऐसे में तो बस कदम दर कदम उपाय ही तो ढूंढे जा सकते हैं। इसलिए जम्मू विवाद में भी सरकार धीरे-धीरे समाधान की ओर बढ़ रही है।


धर्मेद्र केशरी

कहीं वो सीडी तो नहीं!

कॉलबेल बजी। नेताजी ने रामू को आवाज दी कि देख दरवाजे पर कौन है। रामू ने लौटकर एक पैकेट नेताजी को थमा दिया। पैकेट खोलते ही नेताजी को सांस ऊपर-नीचे होने लगी। पैकेट में कुछ और नहीं सीडी था। सीडी देखकर ही नेताजी के माथे पर बल पड़ गया। नेताजी को पसीना-पसीना देखकर घरवाले परेशान हो गए। वो दौड़कर नेताजी के पास पहुंचे और परेशानी का कारण पूछा। नेताजी ने दिल पर हाथ रखकर बिना कुछ कहे सीडी वाले पैकेट की ओर इशारा कर दिया।

नेताजी की बीवी ने सीडी को ओर देखकर कहा- ये तो मात्र सीडी है इसमें इतना परेशान होने की क्या बात है? नेताजी ने कराहते हुए कहा यही तो परेशानी की बात है। आजकल की सीडीयों का कुछ भरोसा नहीं है। कब, कौन सी सीडी सारी पोल पट्टी खोल कर रख दे। बीवी को समझाते हुए उन्होंने कहा- तुमने देखा नहीं सीडी का जिन्न जब-जब बाहर आया है कोई न कोई परेशानी जरूर खड़ी कर दी है। दुश्मनी निकालने का तरीका बन गया है सीडी। बचपन में सांप-सीढ़ी का खेल खेलते थे, अब लोग सीडी-सीडी खेला करते हैं। राजनीति के गलियारों में तो सीडी का भूत कब्जा जमाए बैठा है। किसी से नाराजगी हुईनहीं कि सीडी निकाल के पटक दो। तुमने उमा भारती को नहीं देखा, अपने पूर्व पार्टी को कटघरे में खड़ा करने के लिए उन्होंने सीडी को ही सीढ़ी बनाया।

बीवी समझ गई कि इनकी परेशानी का सबब सीडी का भूत है। बीवी ने कहा- ओफ्फो बस इतनी सी बात, उमा भारती की बात तो आपने की, लेकिन यह भी तो लगभग साबित हो गया कि उन लोगों पर सीडी के जरिए जो भी आरोप लगाए गए थे वो सब सुनियोजित थे। पोल खुलते देख उमा भारती से भी कुछ कहते नहीं बन रहा था। नेताजी आह भरते हुए बोले- हर बार ऐसा थोड़ ही होता है। अगर किसी ने यह सीडी असली बना ली होगी तो फिर मेरी खर नहीं। न जाने क्या-क्या ङोलना पड़ेगा। पहले तो ब्लैकमेल किया जाएगा, पैसे मांगे जाएंगे यहां तक तो ठीक, लेकिन कहीं टीवी वालों के हाथ सीडी लग गई तो ये लोग बिना समङो-बूङो ही पोस्टमार्टम कर डालेंगे।

सच्चाई कुछ भी हो खबर मसालेदार और सनसनीखेज बन ही जाएगी। अरे कोई मुङो अस्पताल भी ले चलो। इतना कहकर नेताजी औंधे मुंह बिस्तर पर गिर पड़े। तभी उनका बेटा दौड़ा हुआ आया और पैकेट खोलकर बोला- यह ‘गरम मसालाज् की सीडी है और आप अपने पास लेकर बैठे हैं। इतना कहकर वो सीडी लेकर चला गया। नेताजी ने चैन की सांस ली कि यह ‘गरम मसालाज् की सीडी है उनके कारनामों की नहीं।


धर्मेद्र केशरी

कब मिलेगा शुभ समाचार?

पाकिस्तान के नए-नवेले राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने उम्मीद जताई है कि कश्मीर पर जल्दी ही कोई शुभ समाचार सुनने को मिल सकता है। आखिर कब तक? जब भी वहां कोई नया राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री चुना जाता है, वह कश्मीर पर शुभ समाचार सुनाने की बात तो ऐसे करता है, जसे दाई बच्चा पैदा होने की खबर सुनाती है। पाकिस्तान को कोई नेता शायद इस मुद्दे पर कोई बात नहीं करना चाहता है। पूर्व राष्ट्रपति मियां परवेज मुशर्रफ भी भारत कई मुद्दों पर बात करने आए थे।

पहले तो यहां की खातिरदारी का जमकर लुत्फ उठाया, लेकिन जब कश्मीर की बात आई तो भाग खड़े हुए। बस, अपनी बेगम से बोले- बेगम बैग पैक करो हमें तुरंत निकलना है। पलटकर कोई जवाब भी नहीं दिया। बेचारे बाजपेयी साहब यही सोचते रह गए कि आखिर मुर्शरफ साहब को अचानक हो क्या गया, जो पिछवाड़े पर पेट्रोल लगे घोड़े की तरह भाग खड़े हुए। यहां पर लोग अटल जी के बारे में तरह-तरह की बातें करते रहे। बेगम सहबा भी साथ आई थीं, आज तक यह राज ही है कि मुशर्रफ मियां अचानक भागे क्यों? शायद मुशर्रफ साहब ने सपने में कश्मीर का कोई भूत देखा था, जो सिर पर पैर रखकर भाग खेड़े हुए। भारत में थे तो पैदाइशी हवेली और दिल्ली का गान गाया, इस्लामाबाद पहुंचते ही सुर बदल लिए।

मियां 9 साल तक पाकिस्तान के सव्रेसर्वा रहे, लेकिन कश्मीर मुद्दे पर ऐसी चुप्पी साधी, जसे हमारे नेताओं को बम ब्लास्ट या आतंकी घटनाओं के बाद खामोशी घेर लेती है। मियां मुशर्रफ क्या पाकिस्तान का कोई भी शासक कश्मीर के मुद्दे पर बोलने से रहा। कोई क्यों भला सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को हाथ से जाने देगा। अब जरदारी साहब ने इस आग में हाथ डालने की बात कही है। उनका कहना है कि मंत्रिमंडल से मशवरे के बाद वो कोई ठोस हल निकालेंगे। जो मियां मुशर्रफ नहीं कर पाए, वो जरदारी साहब करेंगे। भारत आएंगे, घूमेंगे, टहलेंगे, दो-चार बात करेंगे और वापस लौट जाएंगे। दशकों से यही तो होता आ रहा है। भारत सैर करने का मन हुआ, कश्मीर का झोला लेकर चले आए, लेकिन झोले से निकाला कुछ भी नहीं। उन्हें पता है कि जब उनके ‘चच्चाज् इस मामले में इंट्रेस्ट ले रहे हैं तो आसानी से हल कैसे निकाल लेंगे, फिर पाकिस्तान में लोकतंत्र होता तो शायद कोई हल निकल भी जाता, मनमानी तंत्र में तो किसी की नहीं चलने वाली।

जरदारी साहब हमारे देश की जनता और नेताओं ने बर्दाश्त, संयम की घुट्टी पी है। आइए आप भी आइए। हल चलाकर शुभ समाचार की घास ही पैदा कर दीजिए, फसल की उम्मीद भी कर लेंगे। पर आप भी मुशर्रफ की तरह ही ‘मतलबी यार किसके, खाए-पिए खिसकेज् कह कर मत निकल लीजिएगा।
धर्मेद्र केशरी

एक हजार करोड़ का फायदा

पूरे एक हजार करोड़ का फायदा होने वाला है। किसे! ये तो उन्हीं को पता है जो इन रुपयों पर आंख जमाए बैठे हैं। बिहार में बाढ़ पीड़ितों के लिए सरकार ने एक हजार करोड़ का पैकेज देने का एलान किया है। ‘बाढ़ पीड़ितोंज् की बड़ी लंबी लिस्ट है। इसे इतने लोगों में बांटा जाएगा कि पता नहीं यह ज्ज्सच में बाढ़ पीड़ितों में पहुंच पाएगा भी या नहीं। डर है कहीं कोसी की लहर में यह राहत पैकेज न बह जाए। जसा कि अन्य राहत पैकेजों के साथ होता है। मंत्री से लेकर संतरी तक के पॉकेट इन राहत पैकेजों से राहत की सांस लेते हैं।

मैं भी बिहार के बाढ़ का जायजा लेने पहुंचा। किनारे खड़ा होकर दूर तक फैले पानी के चादर को देख ही रहा था कि एक व्यक्ति तिनके के सहारे पार लगता हुआ दिखाई दिया। मैंने कहा- ओ महानुभाव किसी तरह किनारे आ जाओ, ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है, हजार करोड़ के राहत पैकेज की घोषणा हुई है। अब तुम्हें परेशानी नहीं ङोलनी पड़ेगी। वो व्यक्ति कुछ बोला नहीं, बस व्यंग भरी मुस्कान लिए तिनके के सहारे तैरता रहा। मुङो बड़ा बुरा लगा कि एक डूबता व्यक्ति मेरी बातों की अवहेलना कर रहा है। मैंने उसे दोबारा टोंका तो महाशय बोल उठे- बहुत राहत पैकेज की घोषणा हो तो गई, पर हमें क्या मिलने वाला है। हम चाहें डूबे या उतराएं, किसी को फर्क नहीं पड़ने वाला है। यह हमारे लिए नहीं है, इस पैकेज से नेताओं और अफसरों की मौज होने वाली है।

बाढ़ पीड़ितों का तो नहीं पता हां,उनके घरों में पैसों की बाढ़ जरूर आ जाएगी। हमारे झोपड़ियों की परवाह न उन्हें कभी थी और न आगे भी कभी होगी। अगर होती तो हर साल आने वाली इस विकराल बाढ़ का कोई न कोई हल जरूर ही निकाल लेते। प्राकृतिक आपदा बताकर पल्ला थोड़े न झाड़ते। और तो और ये सफेदपोश तुम्हारी तरह ही किनारे बैठकर इस भयंकर स्थिति में भी सियासी रोटियां सेंकने से बाज नहीं आ रहे। एक भाई साहब तो पिछले 15 साल से बिहार के मुख्यमंत्री थे और तब भी कोसी में बाढ़ आती थी, लेकिन उन्हें तब समस्या नहीं लगी और आज कह रहे हैं कि सरकार चाहती तो हम बच सकते थे। सच तो यह है कि न इस सरकार ने चाहा और न उस सरकार ने चाहा था। मौतों पर राजनीति ही इनकी पुरानी आदत है। रही पैकेज की बात, तो लुटेरों की जमात है, जो जितना लूट सकेगा उतना लूटेगा। उनकी जूठन से कुछ बचा तो खानापूर्ति हो जाएगी। इतना कहकर उसने तिनके को जोर से पकड़ कर पार लगने की कोशिश करने लगा।

धर्मेद्र केशरी